अन्वयः
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स्वामि-आदेशात् सुभृत्यस्य क्वचित् भीः न सञ्जायते; सः आहेयम् मुखम् वा दुस्तरम् महा-अर्णवम् प्रविशेत्।
Summary
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Out of obedience to his master's command, a good servant feels no fear; he would enter a serpent's mouth or the impassable great ocean.
सारांश
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स्वामी का आदेश मिलने पर श्रेष्ठ सेवक सर्प के मुख में या दुर्गम महासागर में भी बिना संकोच के प्रवेश कर जाता है।
पदच्छेदः
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| स्वाम्यादेशात् | स्वामिन्–आदेश (५.१) | from the master's command |
| सुभृत्यस्य | सु–भृत्य (६.१) | of a good servant |
| न | न | not |
| भोः | भोस् | O! |
| सञ्जायते | सञ्जायते (सम्√जन् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | arises (hesitation) |
| क्वचित् | क्वचित् | ever |
| प्रविशेत् | प्रविशेत् (प्र√विश् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | would enter |
| मुखम् | मुख (२.१) | mouth |
| आहेयम् | आहेय (२.१) | of a snake |
| दुस्तरम् | दुस्–तर (२.१) | difficult to cross |
| वा | वा | or |
| महार्णवम् | महत्–अर्णव (२.१) | great ocean |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वा | म्या | दे | शा | त्सु | भृ | त्य | स्य |
| न | भोः | स | ञ्जा | य | ते | क्व | चित् |
| प्र | वि | शे | न्मु | ख | मा | हे | यं |
| दु | स्त | रं | वा | म | हा | र्ण | वम् |
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