अन्वयः
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यस्मिन् नियोग-संस्थिते सीमा शुक्ल-पक्षे उडु-राट् इव वृद्धिं समायाति, सः भृत्यः मही-भुजाम् अर्हः।
Summary
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A servant under whose management the borders expand like the moon in the bright fortnight is worthy of kings.
सारांश
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जिस सेवक के प्रशासन में राज्य की सीमाएँ शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की भांति बढ़ती हैं, वह राजा के लिए सेवा योग्य है।
पदच्छेदः
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| सीमा | सीमा (१.१) | prosperity |
| वृद्धिम् | वृद्धि (२.१) | growth |
| समायाति | समायाति (सम्+आ√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | attains |
| शुक्ल-पक्षे | शुक्ल–पक्ष (७.१) | in the bright fortnight |
| इव | इव | like |
| उडुराट् | उडु–राज् (१.१) | moon |
| नियोग-संस्थिते | नियोग–संस्थित (७.१) | being established in duty |
| यस्मिन् | यद् (७.१) | in whom |
| सः | तद् (१.१) | he |
| भृत्यः | भृत्य (१.१) | servant |
| अर्हः | अर्ह (१.१) | worthy |
| महीभुजाम् | महीभुज् (६.३) | of kings |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सी | मा | वृ | द्धिं | स | मा | या | ति |
| शु | क्ल | प | क्ष | इ | वो | डु | राट् |
| नि | यो | ग | सं | स्थि | ते | य | स्मि |
| न्स | भृ | त्यो | ऽर्हो | म | ही | भु | जाम् |
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