सिञ्चन्तीं परमामृतानि दिशि दिश्यप्राकृतैरंशुभिः
खेलन्तीममृतार्णवे मणिमयीमारुह्य नौकां नवाम् ।
स्निग्धापाङ्गतरङ्गशिक्षितभवक्ष्वेआं मुकुन्दश्चिरा
दस्मार्षीदमृतेश्वरीं भगवतीमम्बामहंभावतः ॥
सिञ्चन्तीं परमामृतानि दिशि दिश्यप्राकृतैरंशुभिः
खेलन्तीममृतार्णवे मणिमयीमारुह्य नौकां नवाम् ।
स्निग्धापाङ्गतरङ्गशिक्षितभवक्ष्वेआं मुकुन्दश्चिरा
दस्मार्षीदमृतेश्वरीं भगवतीमम्बामहंभावतः ॥
खेलन्तीममृतार्णवे मणिमयीमारुह्य नौकां नवाम् ।
स्निग्धापाङ्गतरङ्गशिक्षितभवक्ष्वेआं मुकुन्दश्चिरा
दस्मार्षीदमृतेश्वरीं भगवतीमम्बामहंभावतः ॥
विस्तारः
अमृतेश्वरीमहभावतः अस्मार्षीत् । अहं अमृतेश्वरीति ध्यानं । उपास्यापासकश्योरभेदभावना हि ध्यानस्य पराकाष्ठा ॥
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सि | ञ्च | न्तीं | प | र | मा | मृ | ता | नि | दि | शि | दि | श्य | प्रा | कृ | तै | रं | शु | भिः |
| खे | ल | न्ती | म | मृ | ता | र्ण | वे | म | णि | म | यी | मा | रु | ह्य | नौ | कां | न | वाम् |
| स्नि | ग्धा | पा | ङ्ग | त | र | ङ्ग | शि | क्षि | त | भ | व | क्ष्वे | आं | मु | कु | न्द | श्चि | रा |
| द | स्मा | र्षी | द | मृ | ते | श्व | रीं | भ | ग | व | ती | म | म्बा | म | हं | भा | व | तः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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