म्लायन्त्यां वैजयन्त्यामथ कनकपटे धूसरे धूमजालै
श्चक्रे निर्ज्वालचके सपदि परिणतस्फोटशङ्के च शङ्खे ।
उत्सर्पन्तं समन्तादपि परिकलयन्नुद्भटं कालकूटं
कालात्मा पद्मनाभो मनसि विनिदधे कालसंघर्षयोगम् ॥
म्लायन्त्यां वैजयन्त्यामथ कनकपटे धूसरे धूमजालै
श्चक्रे निर्ज्वालचके सपदि परिणतस्फोटशङ्के च शङ्खे ।
उत्सर्पन्तं समन्तादपि परिकलयन्नुद्भटं कालकूटं
कालात्मा पद्मनाभो मनसि विनिदधे कालसंघर्षयोगम् ॥
श्चक्रे निर्ज्वालचके सपदि परिणतस्फोटशङ्के च शङ्खे ।
उत्सर्पन्तं समन्तादपि परिकलयन्नुद्भटं कालकूटं
कालात्मा पद्मनाभो मनसि विनिदधे कालसंघर्षयोगम् ॥
विस्तारः
पद्मनाभः कालसंघर्षयोगं मृत्युना अभिभवसंबन्ध मनसि विनिदधे । विष्णुरपि मृत्युभीत आसीत् । यद्वा-मृत्युभयनिवारणार्थं कालसंघर्षण्याख्याया अमृतेश्वरीविद्यायाः प्रयोगं मनसि विनिदधे दध्यौ ।
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म्ला | य | न्त्यां | वै | ज | य | न्त्या | म | थ | क | न | क | प | टे | धू | स | रे | धू | म | जा | लै |
| श्च | क्रे | नि | र्ज्वा | ल | च | के | स | प | दि | प | रि | ण | त | स्फो | ट | श | ङ्के | च | श | ङ्खे |
| उ | त्स | र्प | न्तं | स | म | न्ता | द | पि | प | रि | क | ल | य | न्नु | द्भ | टं | का | ल | कू | टं |
| का | ला | त्मा | प | द्म | ना | भो | म | न | सि | वि | नि | द | धे | का | ल | सं | घ | र्ष | यो | गम् |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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