तामित्थं स्मरतश्चिरं मधुभिदस्तारां सुधामालिनीं
धूतद्वैतकलङ्कशङ्करकलापुंभावरूपात्मनः ।
पाषाणव्यतिभेदजर्जरजरच्छैवालवत्तत्क्षणा
दारात्किंचिदपासरत्परिगतो हालाहलः सर्वतः ॥
तामित्थं स्मरतश्चिरं मधुभिदस्तारां सुधामालिनीं
धूतद्वैतकलङ्कशङ्करकलापुंभावरूपात्मनः ।
पाषाणव्यतिभेदजर्जरजरच्छैवालवत्तत्क्षणा
दारात्किंचिदपासरत्परिगतो हालाहलः सर्वतः ॥
धूतद्वैतकलङ्कशङ्करकलापुंभावरूपात्मनः ।
पाषाणव्यतिभेदजर्जरजरच्छैवालवत्तत्क्षणा
दारात्किंचिदपासरत्परिगतो हालाहलः सर्वतः ॥
विस्तारः
सुधामालिनीं स्ववत्सुधारमा तारां तारादेवीम् । धूतद्वैतस्य द्वैत (??)तस्य शंकरस्य या कला शक्तिः तस्याः पुंभावः पुरुषरूपेण भवनं, तद्रूप मा यस्य तस्य ! शिवस्य शक्तिरूपिणी या पार्वती तस्या एव पुमाकृतिमत्त्वे (??)त्वात् ॥
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ता | मि | त्थं | स्म | र | त | श्चि | रं | म | धु | भि | द | स्ता | रां | सु | धा | मा | लि | नीं |
| धू | त | द्वै | त | क | ल | ङ्क | श | ङ्क | र | क | ला | पुं | भा | व | रू | पा | त्म | नः |
| पा | षा | ण | व्य | ति | भे | द | ज | र्ज | र | ज | र | च्छै | वा | ल | व | त्त | त्क्ष | णा |
| दा | रा | त्किं | चि | द | पा | स | र | त्प | रि | ग | तो | हा | ला | ह | लः | स | र्व | तः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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