अन्वयः
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हि अवकृष्टायाम् युक्तायाम् नागाः प्रीताः भवन्ति । तथा शुष्क-अवकृष्टायाम् पितृगणः प्रीतः भवेत् ।
Summary
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Indeed, when the Avakrishta is performed, the Nagas become pleased. Similarly, with the Shushka-avakrishta, the host of Pitris (ancestors) would be pleased.
पदच्छेदः
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| युक्तायाम् | युक्त (√युज्+क्त, ७.१) | when performed |
| अवकृष्टायाम् | अवकृष्टा (७.१) | the Avakrishta |
| प्रीताः | प्रीत (√प्री+क्त, १.३) | pleased |
| नागाः | नाग (१.३) | the Nagas |
| भवन्ति | भवन्ति (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | become |
| हि | हि | indeed |
| तथा | तथा | similarly |
| शुष्क-अवकृष्टायाम् | शुष्कावकृष्टा (७.१) | with the Shushka-avakrishta |
| प्रीतः | प्रीत (√प्री+क्त, १.१) | pleased |
| पितृगणः | पितृ–गण (१.१) | the host of Pitris |
| भवेत् | भवेत् (√भू कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | would be |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यु | क्ता | या | म | व | कृ | ष्टा | यां |
| प्री | ता | ना | गा | भ | व | न्ति | हि |
| त | था | शु | ष्का | व | कृ | ष्टा | यां |
| प्री | तः | पि | तृ | ग | णो | भ | वेत् |
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