ममैव वाहर्दिनमश्रुदुर्दिनैः
प्रसह्य वर्षासु ऋतौ प्रसञ्जिते ।
कथं नु शृण्वन्तु सुषुप्य देवता
भवत्वरण्येरुदितं न मे गिरः ॥
ममैव वाहर्दिनमश्रुदुर्दिनैः
प्रसह्य वर्षासु ऋतौ प्रसञ्जिते ।
कथं नु शृण्वन्तु सुषुप्य देवता
भवत्वरण्येरुदितं न मे गिरः ॥
प्रसह्य वर्षासु ऋतौ प्रसञ्जिते ।
कथं नु शृण्वन्तु सुषुप्य देवता
भवत्वरण्येरुदितं न मे गिरः ॥
अन्वयः
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मम अश्रु-दुर्दिनैः प्रसह्य वर्षासु ऋतौ प्रसञ्जिते (सति), वा अहः-दिनम् (अस्ति) । देवताः सुषुप्य कथम् नु शृण्वन्तु? मे गिरः अरण्ये-रुदितम् भवतु, न (किञ्चित्) ।
Summary
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With the rainy days of my tears, a rainy season has been forcefully brought about for me day and night. How can the gods, who are asleep, possibly hear me? Let my words be nothing but a cry in the wilderness.
पदच्छेदः
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| मम | अस्मद् (६.१) | my |
| एव | एव | only |
| वाहर्दिनम् | वा–अहर्–दिनम् | day and night |
| अश्रुदुर्दिनैः | अश्रु–दुर्दिन (३.३) | by the rainy days of tears |
| प्रसह्य | प्रसह्य (प्र√सह्+ल्यप्) | forcefully |
| वर्षासु | वर्षा (७.३) | rainy season |
| ऋतौ | ऋतु (७.१) | in the season |
| प्रसञ्जिते | प्रसञ्जित (प्र√सञ्ज्+क्त, ७.१) | when it has been brought about |
| कथम् | कथम् | how |
| नु | नु | indeed |
| शृण्वन्तु | शृण्वन्तु (√श्रु कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | may they hear |
| सुषुष्य | सुषुष्य (√स्वप्+ल्यप्) | having slept |
| देवताः | देवता (१.३) | the gods |
| भवतु | भवतु (√भू कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let it be |
| अरण्येरुदितम् | अरण्य–रुदित (१.१) | crying in the wilderness |
| न | न | not |
| मे | अस्मद् (६.१) | my |
| गिरः | गिर् (१.३) | words |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | मै | व | वा | ह | र्दि | न | म | श्रु | दु | र्दि | नैः |
| प्र | स | ह्य | व | र्षा | सु | ऋ | तौ | प्र | स | ञ्जि | ते |
| क | थं | नु | शृ | ण्व | न्तु | सु | षु | प्य | दे | व | ता |
| भ | व | त्व | र | ण्ये | रु | दि | तं | न | मे | गि | रः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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