इमा गिरस्तस्य विचिन्त्य चेतसा
तथेति संप्रत्ययमाससाद सा ।
निवारितावग्रहनीरनिर्झरे
नभोनभस्यत्वमलम्भयद्दृशौ ॥
इमा गिरस्तस्य विचिन्त्य चेतसा
तथेति संप्रत्ययमाससाद सा ।
निवारितावग्रहनीरनिर्झरे
नभोनभस्यत्वमलम्भयद्दृशौ ॥
तथेति संप्रत्ययमाससाद सा ।
निवारितावग्रहनीरनिर्झरे
नभोनभस्यत्वमलम्भयद्दृशौ ॥
अन्वयः
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सा तस्य इमाः गिरः चेतसा विचिन्त्य 'तथा' इति संप्रत्ययम् आससाद । (सा) निवारित-अवग्रह-नीर-निर्झरे दृशौ नभः-नभस्यत्वम् अलम्भयत् ।
Summary
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Pondering his words in her mind, she became convinced that it was so. She made her two eyes, from which the stream of tears held back as if by a drought had been restrained, attain the state of the rainy months of Shravana and Bhadrapada (i.e., she began to weep profusely).
पदच्छेदः
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| इमाः | इदम् (२.३) | these |
| गिरः | गिर् (२.३) | words |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| विचिन्त्य | विचिन्त्य (वि√चिन्त्+ल्यप्) | having pondered |
| चेतसा | चेतस् (३.१) | with her mind |
| तथा | तथा | so |
| इति | इति | thus |
| संप्रत्ययम् | संप्रत्यय (२.१) | conviction |
| आससाद | आससाद (आ√सद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | she reached |
| सा | तद् (१.१) | she |
| निवारितावग्रहनीरनिर्झरे | निवारित–अवग्रह–नीर–निर्झर (७.२) | in which the stream of tears held back as if by a drought was restrained |
| नभोनभस्यत्वम् | नभस्–नभस्य–त्व (२.१) | the state of being the rainy months |
| अलम्भयत् | अलम्भयत् (√लभ् +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | caused to obtain |
| दृशौ | दृश् (२.२) | her two eyes |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | मा | गि | र | स्त | स्य | वि | चि | न्त्य | चे | त | सा |
| त | थे | ति | सं | प्र | त्य | य | मा | स | सा | द | सा |
| नि | वा | रि | ता | व | ग्र | ह | नी | र | नि | र्झ | रे |
| न | भो | न | भ | स्य | त्व | म | ल | म्भ | य | द्दृ | शौ |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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