स भिन्नमर्मापि तदर्तिकाकुभिः
स्वदूतधर्मान्न विरन्तुमैहत ।
शनैरशंसन्निभृतं विनिश्वस-
न्विचित्रवाक्चित्रशिखण्डिनन्दनः ॥
स भिन्नमर्मापि तदर्तिकाकुभिः
स्वदूतधर्मान्न विरन्तुमैहत ।
शनैरशंसन्निभृतं विनिश्वस-
न्विचित्रवाक्चित्रशिखण्डिनन्दनः ॥
स्वदूतधर्मान्न विरन्तुमैहत ।
शनैरशंसन्निभृतं विनिश्वस-
न्विचित्रवाक्चित्रशिखण्डिनन्दनः ॥
अन्वयः
AI
विचित्र-वाक्-चित्रशिखण्डि-नन्दनः सः तत्-आर्ति-काकुभिः भिन्न-मर्मा अपि स्व-दूत-धर्मात् विरन्तुम् न ऐहत । निभृतम् विनिश्वसन् शनैः अशंसत् ।
Summary
AI
Though his heart was pierced by her pained and plaintive tones, that Nala, who was like Kartikeya in his eloquent speech, did not wish to desist from his duty as a messenger. Sighing softly, he spoke slowly.
पदच्छेदः
AI
| सः | तद् (१.१) | he |
| भिन्न-मर्मा | भिन्नमर्मन् (१.१) | whose heart was pierced |
| अपि | अपि | although |
| तत्-आर्ति-काकुभिः | तदार्तिकाकु (३.३) | by her pained and plaintive tones |
| स्व-दूत-धर्मात् | स्वदूतधर्म (५.१) | from his duty as a messenger |
| न | न | not |
| विरन्तुम् | विरन्तुम् (वि√रम्+तुमुन्) | to cease |
| ऐहत | ऐहत (√ईह् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | he wished |
| शनैः | शनैस् | slowly |
| अशंसत् | अशंसत् (√शंस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | spoke |
| निभृतम् | निभृतम् | softly |
| विनिश्वसन् | विनिश्वसत् (वि+नि√श्वस्+शतृ, १.१) | sighing |
| विचित्र | विचित्र | varied |
| वाक् | वाच् | speech |
| चित्रशिखण्डि | चित्रशिखण्डिन् | peacock-rider (Shiva) |
| नन्दनः | नन्दन (१.१) | son of (Kartikeya) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | भि | न्न | म | र्मा | पि | त | द | र्ति | का | कु | भिः |
| स्व | दू | त | ध | र्मा | न्न | वि | र | न्तु | मै | ह | त |
| श | नै | र | शं | स | न्नि | भृ | तं | वि | नि | श्व | स |
| न्वि | चि | त्र | वा | क्चि | त्र | शि | ख | ण्डि | न | न्द | नः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.