निपीय पीयूषरसौरसीरसौ
गिरः स्वकंदर्पहुताशनाहुतीः ।
कृतान्तदूतं न तया यथोदितं
कृतान्तमेव स्वममन्यतादयम् ॥
निपीय पीयूषरसौरसीरसौ
गिरः स्वकंदर्पहुताशनाहुतीः ।
कृतान्तदूतं न तया यथोदितं
कृतान्तमेव स्वममन्यतादयम् ॥
गिरः स्वकंदर्पहुताशनाहुतीः ।
कृतान्तदूतं न तया यथोदितं
कृतान्तमेव स्वममन्यतादयम् ॥
अन्वयः
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असौ पीयूष-रस-औरसीः स्व-कंदर्प-हुताशन-आहुतीः (इव) गिरः निपीय, तया यथा-उदितम् कृतान्त-दूतम् न, (किन्तु) अदयम् कृतान्तम् एव स्वम् अमन्यत ।
Summary
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Having drunk her words—which were genuine like nectar but also oblations to the fire of his own love—he (Nala) thought of himself not as the messenger of Yama as she had called him, but as merciless Yama himself.
पदच्छेदः
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| निपीय | निपीय (नि√पा+ल्यप्) | having drunk |
| पीयूष | पीयूष | nectar |
| रस | रस | juice |
| औरसीः | औरसी (२.३) | genuine |
| असौ | अदस् (१.१) | he |
| गिरः | गिर् (२.३) | words |
| स्व | स्व | his own |
| कंदर्प | कंदर्प | love |
| हुताशन | हुताशन | fire |
| आहुतीः | आहुति (२.३) | as oblations to |
| कृतान्त-दूतम् | कृतान्तदूत (२.१) | a messenger of Yama |
| न | न | not |
| तया | तद् (३.१) | by her |
| यथा-उदितम् | यथोदित (२.१) | as spoken |
| कृतान्तम् | कृतान्त (२.१) | Yama |
| एव | एव | himself |
| स्वम् | स्व (२.१) | himself |
| अमन्यत | अमन्यत (√मन् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | he thought |
| अदयम् | अदय (२.१) | merciless |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | पी | य | पी | यू | ष | र | सौ | र | सी | र | सौ |
| गि | रः | स्व | कं | द | र्प | हु | ता | श | ना | हु | तीः |
| कृ | ता | न्त | दू | तं | न | त | या | य | थो | दि | तं |
| कृ | ता | न्त | मे | व | स्व | म | म | न्य | ता | द | यम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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