न्यवेशि रत्नत्रितये जिनेन यः
स धर्मचिन्तामणिरुज्झितो यया ।
कपालिकोपानलभस्मनः कृते
तदेव भस्म स्वकुले स्तृतं तया ॥
न्यवेशि रत्नत्रितये जिनेन यः
स धर्मचिन्तामणिरुज्झितो यया ।
कपालिकोपानलभस्मनः कृते
तदेव भस्म स्वकुले स्तृतं तया ॥
स धर्मचिन्तामणिरुज्झितो यया ।
कपालिकोपानलभस्मनः कृते
तदेव भस्म स्वकुले स्तृतं तया ॥
अन्वयः
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जिनेन यः धर्म-चिन्तामणिः रत्न-त्रितये न्यवेशि, सः यया कपालिक-उप-अनल-भस्मनः कृते उज्झितः, तया स्व-कुले तत् भस्म एव स्तृतम् ।
Summary
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'She who, for the sake of the ashes from the fire of Shiva (Kapalika), abandons that wish-fulfilling gem of Dharma which was placed in the triad of jewels by the Jina, has spread those very ashes over her own family.'
पदच्छेदः
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| न्यवेशि | न्यवेशि (नि√विश् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was placed |
| रत्न-त्रितये | रत्नत्रितय (७.१) | in the triad of jewels |
| जिनेन | जिन (३.१) | by the Jina |
| यः | यद् (१.१) | which |
| सः | तद् (१.१) | that |
| धर्म-चिन्तामणिः | धर्मचिन्तामणि (१.१) | wish-fulfilling gem of Dharma |
| उज्झितः | उज्झित (√उझ्झ्+क्त, १.१) | is abandoned |
| यया | यद् (३.१) | by whom |
| कपालिक | कपालिक | of Shiva |
| उप | उप | like |
| अनल | अनल | fire |
| भस्मनः | भस्मन् (६.१) | of the ash |
| कृते | कृते | for the sake of |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| एव | एव | very |
| भस्म | भस्मन् (१.१) | ash |
| स्व-कुले | स्वकुल (७.१) | on her own family |
| स्तृतम् | स्तृत (√स्तृ+क्त, १.१) | is spread |
| तया | तद् (३.१) | by her |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न्य | वे | शि | र | त्न | त्रि | त | ये | जि | ने | न | यः |
| स | ध | र्म | चि | न्ता | म | णि | रु | ज्झि | तो | य | या |
| क | पा | लि | को | पा | न | ल | भ | स्म | नः | कृ | ते |
| त | दे | व | भ | स्म | स्व | कु | ले | स्तृ | तं | त | या |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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