त्वदास्यनिर्यन्मदलीकदुर्यशो-
मषीमयं सल्लिपिरूपभागिव ।
श्रुतं ममाविश्य भवद्दुरक्षरं
सृजत्यदः कीटवदुत्कटा रुजः ॥
त्वदास्यनिर्यन्मदलीकदुर्यशो-
मषीमयं सल्लिपिरूपभागिव ।
श्रुतं ममाविश्य भवद्दुरक्षरं
सृजत्यदः कीटवदुत्कटा रुजः ॥
मषीमयं सल्लिपिरूपभागिव ।
श्रुतं ममाविश्य भवद्दुरक्षरं
सृजत्यदः कीटवदुत्कटा रुजः ॥
अन्वयः
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सत्-लिपि-रूप-भाक् इव त्वत्-आस्य-निर्यत्-मद्-अलीक-दुर्यशः-मषी-मयम् भवत्-दुरक्षरम् अदः मम श्रुतम् आविश्य कीट-वत् उत्कटाः रुजः सृजति ।
Summary
AI
'Your harsh speech, which is like good writing made of ink that is the false infamy about me emerging from your mouth, enters my ear and, like a worm, creates intense pains.'
पदच्छेदः
AI
| त्वत् | युष्मद् | your |
| आस्य | आस्य | mouth |
| निर्यत् | निर्यत् (निर्√इ+शतृ) | coming out |
| मद् | अस्मद् | my |
| अलीक | अलीक | false |
| दुर्यशः | दुर्यशस् | infamy |
| मषी | मषी | ink |
| मयम् | मय (२.१) | made of |
| सत् | सत् | good |
| लिपि | लिपि | writing |
| रूप | रूप | form |
| भाक् | भाज् (१.१) | possessing |
| इव | इव | like |
| श्रुतम् | श्रुति (२.१) | ear |
| मम | अस्मद् (६.१) | my |
| आविश्य | आविश्य (आ√विश्+ल्यप्) | having entered |
| भवत्-दुरक्षरम् | भवद्दुरक्षर (१.१) | your harsh speech |
| सृजति | सृजति (√सृज् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | creates |
| अदः | अदस् (१.१) | that |
| कीट-वत् | कीटवत् | like a worm |
| उत्कटाः | उत्कट (२.३) | intense |
| रुजः | रुज् (२.३) | pains |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्व | दा | स्य | नि | र्य | न्म | द | ली | क | दु | र्य | शो |
| म | षी | म | यं | स | ल्लि | पि | रू | प | भा | गि | व |
| श्रु | तं | म | मा | वि | श्य | भ | व | द्दु | र | क्ष | रं |
| सृ | ज | त्य | दः | की | ट | व | दु | त्क | टा | रु | जः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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