मतः किमैरावतकुम्भकैतव-
प्रगल्भपीनस्तनदिग्धवस्तव ।
सहस्रनेत्रान्न पृथग्मते मम
त्वदङ्गलक्ष्मीमवगाहितुं क्षमः ॥
मतः किमैरावतकुम्भकैतव-
प्रगल्भपीनस्तनदिग्धवस्तव ।
सहस्रनेत्रान्न पृथग्मते मम
त्वदङ्गलक्ष्मीमवगाहितुं क्षमः ॥
प्रगल्भपीनस्तनदिग्धवस्तव ।
सहस्रनेत्रान्न पृथग्मते मम
त्वदङ्गलक्ष्मीमवगाहितुं क्षमः ॥
अन्वयः
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ऐरावत-कुम्भ-कैतव-प्रगल्भ-पीन-स्तन-दिग्धः (इन्द्रः) वः (तव) मतः किम् ? मम मते सहस्र-नेत्रात् पृथक् (अन्यः कः अपि) त्वत्-अङ्ग-लक्ष्मीम् अवगाहितुं न क्षमः ।
Summary
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Is Indra your choice, who will be smeared by your bold, full breasts that rival the frontal globes of his elephant Airavata? In my opinion, no one other than the thousand-eyed Indra is capable of fully appreciating the beauty of your limbs.
पदच्छेदः
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| मतः | मत (√मन्+क्त, १.१) | is intended/chosen |
| किम् | किम् | is it? |
| ऐरावतकुम्भकैतवप्रगल्भपीनस्तनदिग्धः | ऐरावत–कुम्भ–कैतव–प्रगल्भ–पीन–स्तन–दिग्ध (√दिह्+क्त, १.१) | smeared by your bold, full breasts disguised as Airavata's frontal globes |
| वः | युष्मद् (६.३) | your |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| सहस्रनेत्रात् | सहस्र–नेत्र (५.१) | from the thousand-eyed one (Indra) |
| न | न | not |
| पृथक् | पृथक् | different/other |
| मते | मति (७.१) | in the opinion |
| मम | अस्मद् (६.१) | my |
| त्वदङ्गलक्ष्मीम् | त्वद्–अङ्ग–लक्ष्मी (२.१) | the beauty of your limbs |
| अवगाहितुं | अवगाहितुम् (अव√गाह्+तुमुन्) | to plunge into/enjoy |
| क्षमः | क्षम (१.१) | capable |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | तः | कि | मै | रा | व | त | कु | म्भ | कै | त | व |
| प्र | ग | ल्भ | पी | न | स्त | न | दि | ग्ध | व | स्त | व |
| स | ह | स्र | ने | त्रा | न्न | पृ | थ | ग्म | ते | म | म |
| त्व | द | ङ्ग | ल | क्ष्मी | म | व | गा | हि | तुं | क्ष | मः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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