अनुग्रहादेव दिवौकसां नरो
निरस्य मानुष्यकमेति दिव्यताम् ।
अयोविकारे स्वरितत्वमिष्यते
कुतोऽयसां सिद्धरसस्पृशामपि ॥
अनुग्रहादेव दिवौकसां नरो
निरस्य मानुष्यकमेति दिव्यताम् ।
अयोविकारे स्वरितत्वमिष्यते
कुतोऽयसां सिद्धरसस्पृशामपि ॥
निरस्य मानुष्यकमेति दिव्यताम् ।
अयोविकारे स्वरितत्वमिष्यते
कुतोऽयसां सिद्धरसस्पृशामपि ॥
अन्वयः
AI
नरः दिवौकसां अनुग्रहात् एव मानुष्यकं निरस्य दिव्यताम् एति । सिद्धरस-स्पृशाम् अपि अयसाम् अयोविकारे स्वरितत्वम् इष्यते, (अन्यथा) कुतः (इष्यते)?
Summary
AI
A mortal attains divinity only by the grace of the celestials, having cast off their human state. How can iron be turned into gold unless it is touched by the philosopher's stone? (Implying, you should accept the grace of the gods to attain a higher state).
पदच्छेदः
AI
| अनुग्रहात् | अनुग्रह (५.१) | By the grace |
| एव | एव | alone |
| दिवौकसां | दिवौकस् (६.३) | of the celestials |
| नरः | नर (१.१) | a man |
| निरस्य | निरस्य (नि√अस्+ल्यप्) | having cast off |
| मानुष्यकम् | मानुष्यक (२.१) | humanity |
| एति | एति (√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | attains |
| दिव्यताम् | दिव्यता (२.१) | divinity |
| अयोविकारे | अयस्–विकार (७.१) | in a modification of iron |
| स्वरितत्वम् | स्वरितत्व (२.१) | goldness (poetic) |
| इष्यते | इष्यते (√इष् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is obtained |
| कुतः | कुतः | from where |
| अयसाम् | अयस् (६.३) | of irons |
| सिद्धरसस्पृशाम् | सिद्धरस–स्पृश् (√स्पृश्, ६.३) | of those touched by the philosopher's stone |
| अपि | अपि | even |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | नु | ग्र | हा | दे | व | दि | वौ | क | सां | न | रो |
| नि | र | स्य | मा | नु | ष्य | क | मे | ति | दि | व्य | ताम् |
| अ | यो | वि | का | रे | स्व | रि | त | त्व | मि | ष्य | ते |
| कु | तो | ऽय | सां | सि | द्ध | र | स | स्पृ | शा | म | पि |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.