अहो मनस्त्वामनु तेऽपि तन्वते
त्वमप्यमीभ्यो विमुखीति कौतुकम् ।
क्व वा निधिर्निर्धनमेति किंच तं
स वाक्कवाटं घटयन्निरस्यते ॥
अहो मनस्त्वामनु तेऽपि तन्वते
त्वमप्यमीभ्यो विमुखीति कौतुकम् ।
क्व वा निधिर्निर्धनमेति किंच तं
स वाक्कवाटं घटयन्निरस्यते ॥
त्वमप्यमीभ्यो विमुखीति कौतुकम् ।
क्व वा निधिर्निर्धनमेति किंच तं
स वाक्कवाटं घटयन्निरस्यते ॥
अन्वयः
AI
अहो कौतुकम्, ते अपि त्वाम् अनु मनः तन्वते, त्वम् अपि अमीभ्यः विमुखी इति। निधिः क्व वा निर्धनम् एति? किम् च सः तम् वाक्-कवाटम् घटयन् निरस्यते?
Summary
AI
Nala speaks: 'Oh, what a strange thing! They (the gods) direct their desire towards you, and you are averse to them. Does a treasure ever go to a poor person? And if it does, is it rejected by him closing the door of his speech (by refusing it)?'
पदच्छेदः
AI
| अहो | अहो | Oh! |
| मनः | मनस् (२.१) | desire |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| अनु | अनु | towards |
| ते | तद् (१.३) | they (the gods) |
| अपि | अपि | also |
| तन्वते | तन्वते (√तन् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | extend |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | you |
| अपि | अपि | also |
| अमीभ्यः | अदस् (५.३) | from them |
| विमुखी | विमुखी (१.१) | are averse |
| इति | इति | this is |
| कौतुकम् | कौतुक (१.१) | a strange thing |
| क्व | क्व | Where |
| वा | वा | indeed |
| निधिः | निधि (१.१) | does a treasure |
| निर्धनम् | निर्धन (२.१) | a poor person |
| एति | एति (√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | go to |
| किम् | किम् | And what |
| च | च | and |
| तम् | तद् (२.१) | it |
| सः | तद् (१.१) | he |
| वाक्-कवाटम् | वाच्–कवाट (२.१) | the door of speech |
| घटयन् | घटयत् (√घट्+णिच्+शतृ, १.१) | closing |
| निरस्यते | निरस्यते (निर्√अस् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is it rejected |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | हो | म | न | स्त्वा | म | नु | ते | ऽपि | त | न्व | ते |
| त्व | म | प्य | मी | भ्यो | वि | मु | खी | ति | कौ | तु | कम् |
| क्व | वा | नि | धि | र्नि | र्ध | न | मे | ति | किं | च | तं |
| स | वा | क्क | वा | टं | घ | ट | य | न्नि | र | स्य | ते |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.