सुरेषु संदेशयसीदृशीं बहुं
रसस्रवेण स्तिमितां न भारतीम् ।
मदर्पिता दर्पकतापितेषु या
प्रयाति दावार्दितदाववृष्टिताम् ॥
सुरेषु संदेशयसीदृशीं बहुं
रसस्रवेण स्तिमितां न भारतीम् ।
मदर्पिता दर्पकतापितेषु या
प्रयाति दावार्दितदाववृष्टिताम् ॥
रसस्रवेण स्तिमितां न भारतीम् ।
मदर्पिता दर्पकतापितेषु या
प्रयाति दावार्दितदाववृष्टिताम् ॥
अन्वयः
AI
(किन्तु) सुरेषु ईदृशीं बहुं रस-स्रवेण स्तिमितां भारतीं न संदेशयसि, या मत्-अर्पिता (सती) दर्पक-तापितेषु (तेषु) दाव-अर्दित-दाव-वृष्टितां प्रयाति।
Summary
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"But you do not send such a message, rich and saturated with the flow of sentiment, to the gods. When delivered by me, this message would act like a forest rain on a forest fire for them, who are tormented by the fire of love."
पदच्छेदः
AI
| सुरेषु | सुर (७.३) | to the gods |
| संदेशयसि | संदेशयसि (सम्√दिश् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you send a message |
| ईदृशीम् | ईदृशी (२.१) | such |
| बहुम् | बहु (२.१) | rich |
| रसस्रवेण | रस–स्रव (३.१) | with the flow of sentiment |
| स्तिमिताम् | स्तिमित (२.१) | saturated |
| न | न | not |
| भारतीम् | भारती (२.१) | message |
| मदर्पिता | मद्–अर्पिता (१.१) | delivered by me |
| दर्पकतापितेषु | दर्पक–तापित (७.३) | for them who are tormented by love |
| या | यद् (१.१) | which |
| प्रयाति | प्रयाति (प्र√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | would become |
| दावार्दितदाववृष्टिताम् | दाव–अर्दित–दाववृष्टि–ता (२.१) | the state of being a forest rain on a forest fire |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सु | रे | षु | सं | दे | श | य | सी | दृ | शीं | ब | हुं |
| र | स | स्र | वे | ण | स्ति | मि | तां | न | भा | र | तीम् |
| म | द | र्पि | ता | द | र्प | क | ता | पि | ते | षु | या |
| प्र | या | ति | दा | वा | र्दि | त | दा | व | वृ | ष्टि | ताम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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