श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
संदृब्धार्णववर्णनस्य नवमस्तस्य व्यरंसीन्महा-
काव्ये चारुणि नैषधीयचरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
संदृब्धार्णववर्णनस्य नवमस्तस्य व्यरंसीन्महा-
काव्ये चारुणि नैषधीयचरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
संदृब्धार्णववर्णनस्य नवमस्तस्य व्यरंसीन्महा-
काव्ये चारुणि नैषधीयचरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
अन्वयः
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कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः श्रीहीरः जितेन्द्रियचयम् यं सुतं श्रीहर्षं सुषुवे, मामल्लदेवी च (सुषुवे)। तस्य चारुणि नैषधीयचरिते महाकाव्ये संदृब्ध-अर्णववर्णनस्य निसर्गोज्ज्वलः नवमः सर्गः व्यरंसीत्।
Summary
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Srihira, a diamond among the best poets, and Mamalladevi gave birth to their son, Sriharsha, who had conquered his senses. The ninth canto of his beautiful epic, the Naishadhiyacharita, which is naturally brilliant and contains the description of the ocean, has now concluded.
पदच्छेदः
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| श्रीहर्षम् | श्रीहर्ष (२.१) | Sriharsha |
| कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः | कविराज–राजि–मुकुट–अलंकार–हीर (१.१) | the diamond adorning the crowns of the lineage of the best poets |
| सुतम् | सुत (२.१) | the son |
| श्रीहीरः | श्रीहीर (१.१) | Srihira |
| सुषुवे | सुषुवे (√सू कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | gave birth to |
| जितेन्द्रियचयम् | जित (√जि+क्त)–इन्द्रिय–चय (२.१) | one who has conquered the host of senses |
| मामल्लदेवी | मामल्लदेवी (१.१) | Mamalladevi |
| च | च | and |
| यम् | यद् (२.१) | whom |
| संदृब्ध-अर्णववर्णनस्य | संदृब्ध (सम्√दृभ्+क्त)–अर्णव–वर्णन (६.१) | of the description of the woven ocean |
| नवमः | नवम (१.१) | the ninth |
| तस्य | तद् (६.१) | of his |
| व्यरंसीत् | व्यरंसीत् (वि+आ√रम् कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | has concluded |
| महाकाव्ये | महाकाव्य (७.१) | in the great epic poem |
| चारुणि | चारु (७.१) | beautiful |
| नैषधीयचरिते | नैषधीयचरित (७.१) | in the Naishadhiyacharita |
| सर्गः | सर्ग (१.१) | canto |
| निसर्गोज्ज्वलः | निसर्ग–उज्ज्वल (उद्√ज्वल्+वलच्, १.१) | naturally brilliant |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्री | ह | र्षं | क | वि | रा | ज | रा | जि | मु | कु | टा | लं | का | र | ही | रः | सु | तं |
| श्री | ही | रः | सु | षु | वे | जि | ते | न्द्रि | य | च | यं | मा | म | ल्ल | दे | वी | च | यम् |
| सं | दृ | ब्धा | र्ण | व | व | र्ण | न | स्य | न | व | म | स्त | स्य | व्य | रं | सी | न्म | हा |
| का | व्ये | चा | रु | णि | नै | ष | धी | य | च | रि | ते | स | र्गो | नि | स | र्गो | ज्ज्व | लः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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