चण्डालस्ते विषामविशिखः स्पृश्यते दृश्यते न
ख्यातोऽनङ्गस्त्वयि जयति यः किंनु कृत्ताङ्गुलीकः ।
कृत्वा मित्त्रं मधुमधिवनस्थानमन्तश्चरित्वा
सख्याः प्राणान्हरति हरितस्त्वद्यशस्तज्जुषन्ताम् ॥
चण्डालस्ते विषामविशिखः स्पृश्यते दृश्यते न
ख्यातोऽनङ्गस्त्वयि जयति यः किंनु कृत्ताङ्गुलीकः ।
कृत्वा मित्त्रं मधुमधिवनस्थानमन्तश्चरित्वा
सख्याः प्राणान्हरति हरितस्त्वद्यशस्तज्जुषन्ताम् ॥
ख्यातोऽनङ्गस्त्वयि जयति यः किंनु कृत्ताङ्गुलीकः ।
कृत्वा मित्त्रं मधुमधिवनस्थानमन्तश्चरित्वा
सख्याः प्राणान्हरति हरितस्त्वद्यशस्तज्जुषन्ताम् ॥
अन्वयः
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यः विषम-विशिखः अनङ्गः ख्यातः, सः चण्डालः न स्पृश्यते, न दृश्यते । (सः) त्वयि जयति । ते (सः) किम् नु कृत्त-अङ्गुलीकः? मधुम् अधिवन-स्थानं मित्रं कृत्वा अन्तः चरित्वा सख्याः प्राणान् हरति । हरितः तत् त्वत्-यशः जुषन्ताम् ।
Summary
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'That notorious, bodiless Kama is like an outcaste; he cannot be touched or seen, yet he conquers even you. Is he a thief with severed fingers? Making the forest-dwelling Spring his accomplice, he moves unseen and steals my friend's life. Let the four directions enjoy that fame of yours (for failing to protect her).'
पदच्छेदः
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| चण्डालः | चण्डाल (१.१) | an outcaste |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| विषमविशिखः | विषम–विशिख (१.१) | the one with uneven arrows (Kama) |
| स्पृश्यते | स्पृश्यते (√स्पृश् +यक् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is touched |
| दृश्यते | दृश्यते (√दृश् +यक् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is seen |
| न | न | not |
| ख्यातः | ख्यात (√ख्या+क्त, १.१) | famous |
| अनङ्गः | अनङ्ग (१.१) | the bodiless one |
| त्वयि | युष्मद् (७.१) | you |
| जयति | जयति (√जि कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he conquers |
| यः | यद् (१.१) | who |
| किंनु | किम्–नु | what then? |
| कृत्ताङ्गुलीकः | कृत्त–अङ्गुलीक (१.१) | one whose fingers are cut |
| कृत्वा | कृत्वा (√कृ+क्त्वा) | having made |
| मित्त्रं | मित्र (२.१) | a friend |
| मधुम् | मधु (२.१) | Spring |
| अधिवनस्थानम् | अधिवन–स्थान (२.१) | who dwells in the forest |
| अन्तश्चरित्वा | अन्तश्चरित्वा (अन्तर्√चर्+क्त्वा) | having moved inside/unseen |
| सख्याः | सखी (६.१) | of my friend |
| प्राणान् | प्राण (२.३) | life |
| हरति | हरति (√हृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | steals |
| हरितः | हरित् (१.३) | the directions |
| त्वद्यशः | त्वद्–यशस् (२.१) | your fame |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| जुषन्ताम् | जुषन्ताम् (√जुष् कर्तरि लोट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | let them enjoy |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| च | ण्डा | ल | स्ते | वि | षा | म | वि | शि | खः | स्पृ | श्य | ते | दृ | श्य | ते | न |
| ख्या | तो | ऽन | ङ्ग | स्त्व | यि | ज | य | ति | यः | किं | नु | कृ | त्ता | ङ्गु | ली | कः |
| कृ | त्वा | मि | त्त्रं | म | धु | म | धि | व | न | स्था | न | म | न्त | श्च | रि | त्वा |
| स | ख्याः | प्रा | णा | न्ह | र | ति | ह | रि | त | स्त्व | द्य | श | स्त | ज्जु | ष | न्ताम् |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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