महेन्द्रहेतेरपि रक्षणं भया-
द्यदर्थिसाधारणमस्त्रभृद्द्रतम् ।
प्रसूनबाणादपि मामरक्षतः
क्षतं तदुच्चैरवकीर्णिनस्तव ॥
महेन्द्रहेतेरपि रक्षणं भया-
द्यदर्थिसाधारणमस्त्रभृद्द्रतम् ।
प्रसूनबाणादपि मामरक्षतः
क्षतं तदुच्चैरवकीर्णिनस्तव ॥
द्यदर्थिसाधारणमस्त्रभृद्द्रतम् ।
प्रसूनबाणादपि मामरक्षतः
क्षतं तदुच्चैरवकीर्णिनस्तव ॥
अन्वयः
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यत् अस्त्रभृत्-व्रतम् महेन्द्र-हेतेः अपि भयात् रक्षणम् (इति) अर्थि-साधारणम् (अस्ति), (तत्) प्रसून-बाणात् अपि माम् अरक्षतः अवकीर्णिनः तव उच्चैः क्षतम् ।
Summary
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'The vow of a warrior—to protect any supplicant from fear, even from Indra's weapon—is common to all. That vow is greatly violated by you, who have broken your promise by not protecting me even from the flower-arrows of the god of love.'
पदच्छेदः
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| महेन्द्रहेतेः | महेन्द्र–हेति (५.१) | from the weapon of Indra |
| अपि | अपि | even |
| रक्षणं | रक्षण (१.१) | protection |
| भयात् | भय (५.१) | from fear |
| यत् | यद् (१.१) | which |
| अर्थिसाधारणम् | अर्थिन्–साधारण (१.१) | is common to all supplicants |
| अस्त्रभृद्व्रतम् | अस्त्रभृत्–व्रत (१.१) | the vow of a warrior |
| प्रसूनबाणात् | प्रसून–बाण (५.१) | from the flower-arrowed one (Kama) |
| अपि | अपि | even |
| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
| अरक्षतः | अरक्षत् (√रक्ष्+शतृ, ६.१) | of you who does not protect |
| क्षतं | क्षत (√क्षन्+क्त, १.१) | is violated |
| तत् | तद् (१.१) | that (vow) |
| उच्चैः | उच्चैस् | greatly |
| अवकीर्णिनः | अवकीर्णिन् (६.१) | of you who has broken a vow |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | हे | न्द्र | हे | ते | र | पि | र | क्ष | णं | भ | या |
| द्य | द | र्थि | सा | धा | र | ण | म | स्त्र | भृ | द्द्र | तम् |
| प्र | सू | न | बा | णा | द | पि | मा | म | र | क्ष | तः |
| क्ष | तं | त | दु | च्चै | र | व | की | र्णि | न | स्त | व |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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