अमी समीहैकपरास्तवामराः
स्वकिंकरं मामपि कर्तुमीशिषे ।
विचार्य कार्यं सृज मा विधान्मुधा
कृतानुतापस्त्वयि पार्ष्णिविग्रहम् ॥
अमी समीहैकपरास्तवामराः
स्वकिंकरं मामपि कर्तुमीशिषे ।
विचार्य कार्यं सृज मा विधान्मुधा
कृतानुतापस्त्वयि पार्ष्णिविग्रहम् ॥
स्वकिंकरं मामपि कर्तुमीशिषे ।
विचार्य कार्यं सृज मा विधान्मुधा
कृतानुतापस्त्वयि पार्ष्णिविग्रहम् ॥
अन्वयः
AI
अमी अमराः तव समीहा-एक-पराः (सन्ति)। (त्वम्) माम् अपि स्व-किंकरम् कर्तुम् ईशिषे। कार्यम् विचार्य सृज। मुधा मा विधान्। त्वयि पार्ष्णि-विग्रहम् (कृत्वा) कृत-अनुतापः मा (भूः)।
Summary
AI
"These gods are singularly devoted to winning you," Nala tells Damayanti, "and you have the power to make me your servant as well. Consider your course of action carefully and act. Do not act rashly, lest you later regret a decision that amounts to a self-inflicted wound."
पदच्छेदः
AI
| अमी | अदस् (१.३) | These |
| समीहैकपराः | समीहा–एक–पर (१.३) | are solely devoted to the desire |
| तव | युष्मद् (६.१) | for you, |
| अमराः | अमर (१.३) | gods. |
| स्वकिंकरम् | स्व–किंकर (२.१) | your own servant |
| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
| अपि | अपि | also |
| कर्तुम् | कर्तुम् (√कृ+तुमुन्) | to make |
| ईशिषे | ईशिषे (√ईश् कर्तरि लट् (आत्मने.) म.पु. द्वि.) | you are able. |
| विचार्य | विचार्य (वि√चर्+णिच्+ल्यप्) | Having considered |
| कार्यम् | कार्य (२.१) | what is to be done, |
| सृज | सृज (√सृज् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | act. |
| मा | मा | Do not |
| विधान् | विधान् (वि√धा कर्तरि लुङ् (परस्मै.) म.पु. एक.) | act |
| मुधा | मुधा | in vain. |
| कृतानुतापः | कृत–अनुताप (१.१) | One who regrets later |
| त्वयि | युष्मद् (७.१) | on yourself |
| पार्ष्णिविग्रहम् | पार्ष्णि–विग्रह (२.१) | an attack from the rear. |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | मी | स | मी | है | क | प | रा | स्त | वा | म | राः |
| स्व | किं | क | रं | मा | म | पि | क | र्तु | मी | शि | षे |
| वि | चा | र्य | का | र्यं | सृ | ज | मा | वि | धा | न्मु | धा |
| कृ | ता | नु | ता | प | स्त्व | यि | पा | र्ष्णि | वि | ग्र | हम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.