अये मयात्मा किमनिह्नुतीकृतः
किमत्र मन्ता स तु मां शतक्रतुः ।
पुरः स्वभक्त्याथ नमन्ह्रियाविलो
विलोकिताहे न तदिङ्गितान्यपि ॥
अये मयात्मा किमनिह्नुतीकृतः
किमत्र मन्ता स तु मां शतक्रतुः ।
पुरः स्वभक्त्याथ नमन्ह्रियाविलो
विलोकिताहे न तदिङ्गितान्यपि ॥
किमत्र मन्ता स तु मां शतक्रतुः ।
पुरः स्वभक्त्याथ नमन्ह्रियाविलो
विलोकिताहे न तदिङ्गितान्यपि ॥
अन्वयः
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अये! मया आत्मा किम् अनिह्नुतीकृतः? सः शतक्रतुः तु अत्र माम् किम् मन्ता? अथ पुरः स्व-भक्त्या नमन् (अहम्) ह्रिया आविलः (आसम्)। अहे! तत्-इङ्गितानि अपि न (मया) विलोकितानि।
Summary
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Nala laments, "Alas! Have I revealed my true self? What will Indra think of me now? Bowing before him with devotion, I was so overcome with shame. Oh! I was so agitated that I failed to even notice his reactions or gestures."
पदच्छेदः
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| अये | अये | Alas! |
| मया | अस्मद् (३.१) | By me |
| आत्मा | आत्मन् (१.१) | my self |
| किम् | किम् | has |
| अनिह्नुतीकृतः | अनिह्नुतीकृत (√कृ+च्वि+क्त, १.१) | been revealed? |
| किम् | किम् | What |
| अत्र | अत्र | in this matter |
| मन्ता | मन्तृ (√मन्, १.१) | will think |
| सः | तद् (१.१) | he, |
| तु | तु | indeed, |
| माम् | अस्मद् (२.१) | of me |
| शतक्रतुः | शतक्रतु (१.१) | Indra? |
| पुरः | पुरस् | Before, |
| स्वभक्त्या | स्व–भक्ति (३.१) | with my devotion, |
| अथ | अथ | then, |
| नमन् | नमत् (√नम्+शतृ, १.१) | bowing, |
| ह्रिया | ह्री (३.१) | with shame |
| आविलः | आविल (१.१) | agitated, |
| विलोकितानि | विलोकित (वि√लोक्+क्त, १.३) | were seen. |
| अहे | अहे | Oh! |
| न | न | Not |
| तदिङ्गितानि | तद्–इङ्गित (१.३) | his gestures |
| अपि | अपि | even |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ये | म | या | त्मा | कि | म | नि | ह्नु | ती | कृ | तः |
| कि | म | त्र | म | न्ता | स | तु | मां | श | त | क्र | तुः |
| पु | रः | स्व | भ | क्त्या | थ | न | म | न्ह्रि | या | वि | लो |
| वि | लो | कि | ता | हे | न | त | दि | ङ्गि | ता | न्य | पि |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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