मुनिर्यथात्मानमथ प्रबोधवा-
न्प्रकाशयन्तं स्वमसावबुध्यत ।
अपि प्रपन्नां प्रकृतिं विलोक्य ताम्
अवाप्तसंस्कारतयासृजद्गिरः ॥
मुनिर्यथात्मानमथ प्रबोधवा-
न्प्रकाशयन्तं स्वमसावबुध्यत ।
अपि प्रपन्नां प्रकृतिं विलोक्य ताम्
अवाप्तसंस्कारतयासृजद्गिरः ॥
न्प्रकाशयन्तं स्वमसावबुध्यत ।
अपि प्रपन्नां प्रकृतिं विलोक्य ताम्
अवाप्तसंस्कारतयासृजद्गिरः ॥
अन्वयः
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अथ असौ प्रबोधवान् (सन्) मुनिः यथा स्वम् प्रकाशयन्तम् आत्मानम् अबुध्यत। ताम् प्रकृतिम् प्रपन्नाम् (स्थितिम्) अपि विलोक्य अवाप्त-संस्कारतया गिरः असृजत्।
Summary
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Then, regaining consciousness, Nala realized his true self, much like an enlightened sage realizes the Self. Seeing that he had returned to his natural state, he spoke words born from his revived innate refinement.
पदच्छेदः
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| मुनिः | मुनि (१.१) | a sage |
| यथा | यथा | as |
| आत्मानम् | आत्मन् (२.१) | the self, |
| अथ | अथ | Then |
| प्रबोधवान् | प्रबोधवत् (१.१) | having regained consciousness, |
| प्रकाशयन्तम् | प्रकाशयन्त (प्र√काश्+णिच्+शतृ, २.१) | revealing |
| स्वम् | स्व (२.१) | itself, |
| असौ | अदस् (१.१) | he (Nala) |
| अबुध्यत | अबुध्यत (√बुध् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | realized. |
| अपि | अपि | Also, |
| प्रपन्नाम् | प्रपन्न (प्र√पद्+क्त, २.१) | having returned to |
| प्रकृतिम् | प्रकृति (२.१) | his natural state, |
| विलोक्य | विलोक्य (वि√लोक्+ल्यप्) | having seen |
| ताम् | तद् (२.१) | that, |
| अवाप्तसंस्कारतया | अवाप्त–संस्कारता (३.१) | due to his revived innate refinement, |
| असृजत् | असृजत् (√सृज् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he uttered |
| गिरः | गिर् (२.३) | words. |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मु | नि | र्य | था | त्मा | न | म | थ | प्र | बो | ध | वा |
| न्प्र | का | श | य | न्तं | स्व | म | सा | व | बु | ध्य | त |
| अ | पि | प्र | प | न्नां | प्र | कृ | तिं | वि | लो | क्य | ता |
| म | वा | प्त | सं | स्का | र | त | या | सृ | ज | द्गि | रः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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