अधीतपञ्चाशुगबाणवञ्चने
स्थिता मदन्तर्बहिरेषि चेदुरेः ।
स्मराशुगेभ्यो हृदयं बिभेतु न
प्रविश्य तत्त्वन्मयसंपुटे मम ॥
अधीतपञ्चाशुगबाणवञ्चने
स्थिता मदन्तर्बहिरेषि चेदुरेः ।
स्मराशुगेभ्यो हृदयं बिभेतु न
प्रविश्य तत्त्वन्मयसंपुटे मम ॥
स्थिता मदन्तर्बहिरेषि चेदुरेः ।
स्मराशुगेभ्यो हृदयं बिभेतु न
प्रविश्य तत्त्वन्मयसंपुटे मम ॥
अन्वयः
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अधीतपञ्चाशुगबाणवञ्चने ! मदन्तः स्थिता (त्वम्) चेत् उरेः बहिः एषि, (तर्हि) मम तत् त्वन्मयसंपुटे प्रविश्य हृदयम् स्मराशुगेभ्यः न बिभेतु ।
Summary
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"O you who have mastered deceiving Kama's arrows! If you, who reside within me, come out from my chest, then let my heart not fear Kama's arrows, by entering that casket which is made entirely of you."
पदच्छेदः
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| अधीतपञ्चाशुगबाणवञ्चने | अधीत (अधि√इ+क्त)–पञ्चाशुग–बाण–वञ्चना (८.१) | O you who have mastered deceiving the arrows of the five-arrowed one (Kama) |
| स्थिता | स्थित (√स्था+क्त, १.१) | residing |
| मदन्तः | मद्–अन्तर् | within me |
| बहिः | बहिस् | outside |
| एषि | एषि (√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you go |
| चेत् | चेत् | if |
| उरेः | उरस् (५.१) | from my chest |
| स्मराशुगेभ्यः | स्मर–आशुग (५.३) | from Kama's arrows |
| हृदयम् | हृदय (१.१) | heart |
| बिभेतु | बिभेतु (√भी कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let it fear |
| न | न | not |
| प्रविश्य | प्रविश्य (प्र√विश्+ल्यप्) | having entered |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| त्वन्मयसंपुटे | त्वद्–मय–संपुट (७.१) | in the casket made of you |
| मम | अस्मद् (६.१) | my |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | धी | त | प | ञ्चा | शु | ग | बा | ण | व | ञ्च | ने |
| स्थि | ता | म | द | न्त | र्ब | हि | रे | षि | चे | दु | रेः |
| स्म | रा | शु | गे | भ्यो | हृ | द | यं | बि | भे | तु | न |
| प्र | वि | श्य | त | त्त्व | न्म | य | सं | पु | टे | म | म |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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