स्मरेषुमाथं सहसे मृदुः कथं
हृदि द्रढीयः कुचसंवृते तव ।
निपत्य वैसारिणकेतनस्य वा
व्रजन्ति बाणा विमुखोत्पतिष्णुताम् ॥
स्मरेषुमाथं सहसे मृदुः कथं
हृदि द्रढीयः कुचसंवृते तव ।
निपत्य वैसारिणकेतनस्य वा
व्रजन्ति बाणा विमुखोत्पतिष्णुताम् ॥
हृदि द्रढीयः कुचसंवृते तव ।
निपत्य वैसारिणकेतनस्य वा
व्रजन्ति बाणा विमुखोत्पतिष्णुताम् ॥
अन्वयः
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मृदुः (त्वम्) तव द्रढीयः कुचसंवृते हृदि स्मरेषुमाथम् कथम् सहसे? वा वैसारिणकेतनस्य बाणाः निपत्य विमुखोत्पतिष्णुताम् व्रजन्ति?
Summary
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"Being so delicate, how do you endure the torment of Kama's arrows in your heart, which is covered by your very firm breasts? Or is it that the arrows of the fish-bannered god (Kama), upon striking, are turned back and fly away?"
पदच्छेदः
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| स्मरेषुमाथम् | स्मर–इषु–माथ (२.१) | the torment of Kama's arrows |
| सहसे | सहसे (√सह् कर्तरि लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | you endure |
| मृदुः | मृदु (१.१) | delicate one |
| कथम् | कथम् | how |
| हृदि | हृद् (७.१) | in the heart |
| द्रढीयः | द्रढीयस् (७.१) | very firm |
| कुचसंवृते | कुच–संवृत (सम्√वृ+क्त, ७.१) | covered by breasts |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| निपत्य | निपत्य (नि√पत्+ल्यप्) | having fallen upon |
| वैसारिणकेतनस्य | वैसारिण–केतन (६.१) | of the fish-bannered one (Kama) |
| वा | वा | or |
| व्रजन्ति | व्रजन्ति (√व्रज् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | go to |
| बाणाः | बाण (१.३) | arrows |
| विमुखोत्पतिष्णुताम् | विमुख–उत्पतिष्णुता (२.१) | the state of flying away turned back |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्म | रे | षु | मा | थं | स | ह | से | मृ | दुः | क | थं |
| हृ | दि | द्र | ढी | यः | कु | च | सं | वृ | ते | त | व |
| नि | प | त्य | वै | सा | रि | ण | के | त | न | स्य | वा |
| व्र | ज | न्ति | बा | णा | वि | मु | खो | त्प | ति | ष्णु | ताम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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