अपास्तपाथोरुहि शायितं करे
करोषि लीलाकमलं किमाननम् ।
तनोषि हारं कियदश्रुणः स्रवैः
अदोषनिर्वासितभूषणे हृदि ॥
अपास्तपाथोरुहि शायितं करे
करोषि लीलाकमलं किमाननम् ।
तनोषि हारं कियदश्रुणः स्रवैः
अदोषनिर्वासितभूषणे हृदि ॥
करोषि लीलाकमलं किमाननम् ।
तनोषि हारं कियदश्रुणः स्रवैः
अदोषनिर्वासितभूषणे हृदि ॥
अन्वयः
AI
अपास्तपाथोरुहि करे शायितम् आननम् किम् लीलाकमलम् करोषि? अदोषनिर्वासितभूषणे हृदि अश्रुणः स्रवैः कियत् हारम् तनोषि?
Summary
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"Why do you make your face, resting on your hand from which the lotus has been cast away, a play-lotus? On your heart, which has banished ornaments due to its own faultless beauty, how long will you fashion a necklace with streams of your tears?"
पदच्छेदः
AI
| अपास्तपाथोरुहि | अपास्त (अप+आ√अस्+क्त)–पाथोरुह (७.१) | from which the lotus has been cast away |
| शायितम् | शायित (√शी+क्त, २.१) | rested |
| करे | कर (७.१) | on the hand |
| करोषि | करोषि (√कृ कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you make |
| लीलाकमलम् | लीला–कमल (२.१) | a play-lotus |
| किम् | किम् | why |
| आननम् | आनन (२.१) | your face |
| तनोषि | तनोषि (√तन् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you fashion |
| हारम् | हार (२.१) | a necklace |
| कियत् | कियत् | how much/long |
| अश्रुणः | अश्रु (६.१) | of tears |
| स्रवैः | स्रव (३.३) | with streams |
| अदोषनिर्वासितभूषणे | अदोष–निर्वासित (निर्√वस्+णिच्+क्त)–भूषण (७.१) | on which ornaments have been banished due to its faultlessness |
| हृदि | हृद् (७.१) | on the heart |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | पा | स्त | पा | थो | रु | हि | शा | यि | तं | क | रे |
| क | रो | षि | ली | ला | क | म | लं | कि | मा | न | नम् |
| त | नो | षि | हा | रं | कि | य | द | श्रु | णः | स्र | वैः |
| अ | दो | ष | नि | र्वा | सि | त | भू | ष | णे | हृ | दि |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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