चकास्ति बिन्दुच्युतकातिचातुरी
घनास्रुबिन्दुस्रुतिकैतवात्तव ।
मसारताराक्षि ससारमात्मना
तनोषि संसारमसंशयं यतः ॥
चकास्ति बिन्दुच्युतकातिचातुरी
घनास्रुबिन्दुस्रुतिकैतवात्तव ।
मसारताराक्षि ससारमात्मना
तनोषि संसारमसंशयं यतः ॥
घनास्रुबिन्दुस्रुतिकैतवात्तव ।
मसारताराक्षि ससारमात्मना
तनोषि संसारमसंशयं यतः ॥
अन्वयः
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मसारताराक्षि ! तव घनास्रुबिन्दुस्रुतिकैतवात् बिन्दुच्युतकातिचातुरी चकास्ति । यतः आत्मना ससारम् संसारम् असंशयम् तनोषि ।
Summary
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"O you with eyes like sapphires! Under the pretext of shedding thick teardrops, the great skill of the 'binduchyutaka' poetic composition shines forth. Because of this, you undoubtedly make this worldly existence meaningful by your very presence."
पदच्छेदः
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| चकास्ति | चकास्ति (√काश् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | shines |
| बिन्दुच्युतकातिचातुरी | बिन्दु–च्युतक–अति–चातुरी (१.१) | the great skill of the 'binduchyutaka' composition |
| घनास्रुबिन्दुस्रुतिकैतवात् | घन–अश्रु–बिन्दु–स्रुति–कैतव (५.१) | from the pretext of the flow of thick teardrops |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| मसारताराक्षि | मसार–तार–अक्षिन् (८.१) | O you with pupils like sapphires |
| ससारम् | ससार (२.१) | meaningful |
| आत्मना | आत्मन् (३.१) | by your own self |
| तनोषि | तनोषि (√तन् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you expand/create |
| संसारम् | संसार (२.१) | the worldly existence |
| असंशयम् | असंशयम् | undoubtedly |
| यतः | यतः | because |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| च | का | स्ति | बि | न्दु | च्यु | त | का | ति | चा | तु | री |
| घ | ना | स्रु | बि | न्दु | स्रु | ति | कै | त | वा | त्त | व |
| म | सा | र | ता | रा | क्षि | स | सा | र | मा | त्म | ना |
| त | नो | षि | सं | सा | र | म | सं | श | यं | य | तः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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