स्वर्णैर्वितीर्णैः करवाम वाम-
नेत्रे भवत्या किमुपासनासु ।
अङ्ग त्वदङ्गानि निपीतपीत-
दर्पाणि पाणिः खलु याचते नः ॥
स्वर्णैर्वितीर्णैः करवाम वाम-
नेत्रे भवत्या किमुपासनासु ।
अङ्ग त्वदङ्गानि निपीतपीत-
दर्पाणि पाणिः खलु याचते नः ॥
नेत्रे भवत्या किमुपासनासु ।
अङ्ग त्वदङ्गानि निपीतपीत-
दर्पाणि पाणिः खलु याचते नः ॥
अन्वयः
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हे वाम-नेत्रे ! भवत्याः उपासनासु वितीर्णैः स्वर्णैः किम् करवाम? हे अङ्ग ! नः पाणिः खलु निपीत-पीत-दर्पाणि त्वत्-अङ्गानि याचते ।
Summary
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O lovely-eyed one! What shall we do with the gold offered in your worship? O dear one! Our hand indeed begs for your limbs, which have surpassed the pride of gold's yellow hue.
पदच्छेदः
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| स्वर्णैः | स्वर्ण (३.३) | with gold |
| वितीर्णैः | वितीर्ण (वि√तॄ+क्त, ३.३) | offered |
| करवाम | करवाम (√कृ कर्तरि लोट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | what shall we do |
| वामनेत्रे | वामनेत्रा (८.१) | O lovely-eyed one |
| भवत्या | भवत् (६.१) | your |
| किम् | किम् | what |
| उपासनासु | उपासना (७.३) | in worship |
| अङ्ग | अङ्ग (८.१) | O dear one |
| त्वत् | युष्मद् | your |
| अङ्गानि | अङ्ग (२.३) | limbs |
| निपीत | निपीत (नि√पा+क्त) | which have drunk up |
| पीत | पीत | of yellow (gold) |
| दर्पाणि | दर्प (२.३) | the pride |
| पाणिः | पाणि (१.१) | hand |
| खलु | खलु | indeed |
| याचते | याचते (√याच् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | begs for |
| नः | अस्मद् (६.३) | our |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्व | र्णै | र्वि | ती | र्णैः | क | र | वा | म | वा | म |
| ने | त्रे | भ | व | त्या | कि | मु | पा | स | ना | सु |
| अ | ङ्ग | त्व | द | ङ्गा | नि | नि | पी | त | पी | त |
| द | र्पा | णि | पा | णिः | ख | लु | या | च | ते | नः |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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