दयस्व किं घातयसि त्वमस्मान्
अनङ्गचण्डालशरैरदृश्यैः ।
भिन्ना वरं तीक्ष्णकटाक्षबाणैः
प्रेमस्तव प्रेमरसात्पवित्रैः ॥
दयस्व किं घातयसि त्वमस्मान्
अनङ्गचण्डालशरैरदृश्यैः ।
भिन्ना वरं तीक्ष्णकटाक्षबाणैः
प्रेमस्तव प्रेमरसात्पवित्रैः ॥
अनङ्गचण्डालशरैरदृश्यैः ।
भिन्ना वरं तीक्ष्णकटाक्षबाणैः
प्रेमस्तव प्रेमरसात्पवित्रैः ॥
अन्वयः
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दयस्व । त्वम् अदृश्यैः अनङ्ग-चण्डाल-शरैः अस्मान् किम् घातयसि? प्रेम-रसात् पवित्रैः (तव) प्रेम-स्तव-तीक्ष्ण-कटाक्ष-बाणैः भिन्नाः (वयम्) वरम् ।
Summary
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Have mercy! Why do you have us slain by the invisible arrows of the outcaste Cupid? It would be better for us to be pierced by your sharp sidelong-glance arrows, which are born of your love and purified by the essence of affection.
पदच्छेदः
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| दयस्व | दयस्व (√दय् कर्तरि लोट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | have mercy |
| किम् | किम् | why |
| घातयसि | घातयसि (√हन् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | do you cause to be slain |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | you |
| अस्मान् | अस्मद् (२.३) | us |
| अनङ्ग | अनङ्ग | Cupid |
| चण्डाल | चण्डाल | the outcaste |
| शरैः | शर (३.३) | by the arrows of |
| अदृश्यैः | अदृश्य (३.३) | by the invisible |
| भिन्नाः | भिन्न (√भिद्+क्त, १.३) | (we) pierced |
| वरम् | वरम् | it is better |
| तीक्ष्ण | तीक्ष्ण | sharp |
| कटाक्ष | कटाक्ष | sidelong glance |
| बाणैः | बाण (३.३) | by the arrows of |
| प्रेम | प्रेमन् | of love |
| स्तव | स्तव | your praise |
| प्रेम | प्रेमन् | of love |
| रसात् | रस (५.१) | from the essence |
| पवित्रैः | पवित्र (३.३) | by the pure |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द | य | स्व | किं | घा | त | य | सि | त्व | म | स्मा |
| न | न | ङ्ग | च | ण्डा | ल | श | रै | र | दृ | श्यैः |
| भि | न्ना | व | रं | ती | क्ष्ण | क | टा | क्ष | बा | णैः |
| प्रे | म | स्त | व | प्रे | म | र | सा | त्प | वि | त्रैः |
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