समं सपत्नीभवदुःखतीक्ष्णैः
स्वदारनासापथिकैर्मरुद्भिः ।
अनङ्गशौर्यानलतापदुःस्थैः
अथ प्रतस्थे हरितां मरुद्भिः ॥
समं सपत्नीभवदुःखतीक्ष्णैः
स्वदारनासापथिकैर्मरुद्भिः ।
अनङ्गशौर्यानलतापदुःस्थैः
अथ प्रतस्थे हरितां मरुद्भिः ॥
स्वदारनासापथिकैर्मरुद्भिः ।
अनङ्गशौर्यानलतापदुःस्थैः
अथ प्रतस्थे हरितां मरुद्भिः ॥
अन्वयः
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अथ अनङ्ग-शौर्य-अनल-ताप-दुःस्थैः हरिताम् मरुद्भिः, सपत्नी-भवत्-दुःख-तीक्ष्णैः स्व-दार-नासा-पथिकैः मरुद्भिः (श्वासैः) समम् प्रतस्थे ।
Summary
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Then the gods of the directions, afflicted by the heat from the fire of Kama's prowess, set out, accompanied by their sighs, which were sharp with the pain of their own wives becoming co-wives and which traveled the path of their nostrils.
पदच्छेदः
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| समम् | समम् | along with |
| सपत्नीभवदुःखतीक्ष्णैः | सपत्नी–भवत्–दुःख–तीक्ष्ण (३.३) | with those sharp with the pain of their wives becoming co-wives |
| स्वदारनासापथिकैः | स्व–दार–नासा–पथिक (३.३) | traveling the path of their own wives' noses |
| मरुद्भिः | मरुत् (३.३) | with sighs |
| अनङ्गशौर्यानलतापदुःस्थैः | अनङ्ग–शौर्य–अनल–ताप–दुःस्थ (३.३) | by those afflicted by the heat of the fire of Kama's prowess |
| अथ | अथ | then |
| प्रतस्थे | प्रतस्थे (प्र√स्था कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | set out |
| हरिताम् | हरित् (६.३) | of the directions |
| मरुद्भिः | मरुत् (३.३) | the gods |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | मं | स | प | त्नी | भ | व | दुः | ख | ती | क्ष्णैः |
| स्व | दा | र | ना | सा | प | थि | कै | र्म | रु | द्भिः |
| अ | न | ङ्ग | शौ | र्या | न | ल | ता | प | दुः | स्थैः |
| अ | थ | प्र | त | स्थे | ह | रि | तां | म | रु | द्भिः |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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