सारोत्थधारेव सुधारसस्य
स्वयंवरः श्वो भविता तवेति ।
संतर्पयन्ती दमयन्ति तेषां
श्रुतिः श्रुती नाकजुषामयासीत् ॥
सारोत्थधारेव सुधारसस्य
स्वयंवरः श्वो भविता तवेति ।
संतर्पयन्ती दमयन्ति तेषां
श्रुतिः श्रुती नाकजुषामयासीत् ॥
स्वयंवरः श्वो भविता तवेति ।
संतर्पयन्ती दमयन्ति तेषां
श्रुतिः श्रुती नाकजुषामयासीत् ॥
अन्वयः
AI
दमयन्ति! "तव स्वयंवरः श्वः भविता" इति (इयम्) श्रुतिः, सुधा-रसस्य सार-उत्थ-धारा इव, संतर्पयन्ती (सती) तेषाम् नाक-जुषाम् श्रुती अयासीत् ।
Summary
AI
O Damayanti! The news, "Your svayamvara will be tomorrow," satisfying them like a stream of the very essence of nectar, reached the ears of those heaven-dwellers.
पदच्छेदः
AI
| सारोत्थधारेव | सार–उत्थ–धारा–इव | like a stream arising from the essence |
| सुधारसस्य | सुधा–रस (६.१) | of nectar |
| स्वयंवरः | स्वयंवर (१.१) | the svayamvara |
| श्वः | श्वस् | tomorrow |
| भविता | भविता (√भू कर्तरि लुट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | will be |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| इति | इति | thus |
| संतर्पयन्ती | संतर्पयन्ती (सम्√तृप्+णिच्+शतृ, १.१) | satisfying |
| दमयन्ति | दमयन्ती (८.१) | O Damayanti |
| तेषाम् | तद् (६.३) | their |
| श्रुतिः | श्रुति (१.१) | the news |
| श्रुती | श्रुति (२.२) | the two ears |
| नाकजुषाम् | नाक–जुष् (६.३) | of the heaven-dwellers |
| अयासीत् | अयासीत् (√या कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | went |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सा | रो | त्थ | धा | रे | व | सु | धा | र | स | स्य |
| स्व | यं | व | रः | श्वो | भ | वि | ता | त | वे | ति |
| सं | त | र्प | य | न्ती | द | म | य | न्ति | ते | षां |
| श्रु | तिः | श्रु | ती | ना | क | जु | षा | म | या | सीत् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.