यस्तन्वि भर्ता घुसृणेन सायं
दिशः समालम्भनकौतुकिन्याः ।
तदा स चेतः प्रजिघाय तुभ्यं
यदा गतो नैति निवृत्य पान्थः ॥
यस्तन्वि भर्ता घुसृणेन सायं
दिशः समालम्भनकौतुकिन्याः ।
तदा स चेतः प्रजिघाय तुभ्यं
यदा गतो नैति निवृत्य पान्थः ॥
दिशः समालम्भनकौतुकिन्याः ।
तदा स चेतः प्रजिघाय तुभ्यं
यदा गतो नैति निवृत्य पान्थः ॥
अन्वयः
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तन्वि! यः सायं समालम्भन-कौतुकिन्याः दिशः घुसृणेन भर्ता (अस्ति), सः तदा तुभ्यम् चेतः प्रजिघाय, यदा गतः पान्थः निवृत्य न एति ।
Summary
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O slender one! He (the Sun), who is the husband of the evening twilight eager to be anointed with the saffron of sunset, sent his heart to you at that time when a departed traveler does not return.
पदच्छेदः
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| यः | यद् (१.१) | who |
| तन्वि | तन्वी (८.१) | O slender one |
| भर्ता | भर्तृ (१.१) | is the husband |
| घुसृणेन | घुसृण (३.१) | with saffron |
| सायम् | सायम् | in the evening |
| दिशः | दिश् (६.१) | of the direction (twilight) |
| समालम्भनकौतुकिन्याः | समालम्भन–कौतुकिन् (६.१) | eager for anointing |
| तदा | तदा | then |
| सः | तद् (१.१) | he (the Sun) |
| चेतः | चेतस् (२.१) | his heart |
| प्रजिघाय | प्रजिघाय (प्र√हि कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | sent |
| तुभ्यम् | युष्मद् (४.१) | to you |
| यदा | यदा | when |
| गतः | गत (√गम्+क्त, १.१) | a departed |
| न | न | not |
| एति | एति (√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | returns |
| निवृत्य | निवृत्य (नि√वृत्+ल्यप्) | having turned back |
| पान्थः | पान्थ (१.१) | traveler |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | स्त | न्वि | भ | र्ता | घु | सृ | णे | न | सा | यं |
| दि | शः | स | मा | ल | म्भ | न | कौ | तु | कि | न्याः |
| त | दा | स | चे | तः | प्र | जि | घा | य | तु | भ्यं |
| य | दा | ग | तो | नै | ति | नि | वृ | त्य | पा | न्थः |
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