स्वाच्छन्द्यमानन्दपरंपराणां
भैमी तमालोक्य किमप्यवाप ।
महारयं निर्झरिणीव वाराम्
आसाद्य धाराधरकेलिकालम् ॥
स्वाच्छन्द्यमानन्दपरंपराणां
भैमी तमालोक्य किमप्यवाप ।
महारयं निर्झरिणीव वाराम्
आसाद्य धाराधरकेलिकालम् ॥
भैमी तमालोक्य किमप्यवाप ।
महारयं निर्झरिणीव वाराम्
आसाद्य धाराधरकेलिकालम् ॥
अन्वयः
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भैमी तम् आलोक्य आनन्द-परंपराणां किम् अपि स्वाच्छन्द्यम् अवाप, निर्झरिणी धाराधर-केलि-कालं वाराम् आसाद्य महा-रयम् इव।
Summary
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Upon seeing him, Damayanti attained an indescribable freedom of successive joys, just as a river, upon reaching the season of the cloud's sport (monsoon), attains a great flow of water.
पदच्छेदः
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| स्वाच्छन्द्यम् | स्वाच्छन्द्य (२.१) | freedom/spontaneity |
| आनन्दपरंपराणां | आनन्द–परंपरा (६.३) | of successive joys |
| भैमी | भैमी (१.१) | Damayanti |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| आलोक्य | आलोक्य (आ√लोक्+ल्यप्) | having seen |
| किमप्यवाप | किम् अपि–अवाप | attained something indescribable |
| महारयं | महा–रय (२.१) | a great flow |
| निर्झरिणीव | निर्झरिणी–इव | like a river |
| वाराम् | वारा (२.१) | of water |
| आसाद्य | आसाद्य (आ√सद्+ल्यप्) | having reached |
| धाराधरकेलिकालम् | धाराधर–केलि–काल (२.१) | the time of the cloud's sport (monsoon) |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वा | च्छ | न्द्य | मा | न | न्द | प | रं | प | रा | णां |
| भै | मी | त | मा | लो | क्य | कि | म | प्य | वा | प |
| म | हा | र | यं | नि | र्झ | रि | णी | व | वा | रा |
| मा | सा | द्य | धा | रा | ध | र | के | लि | का | लम् |
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