त्वद्गोचरस्तं खलु पञ्चबाणः
करोति संताप्य तथा विनीतम् ।
स्वयं यथा स्वादिततप्तभूयः
परं न संतापयिता स भूयः ॥
त्वद्गोचरस्तं खलु पञ्चबाणः
करोति संताप्य तथा विनीतम् ।
स्वयं यथा स्वादिततप्तभूयः
परं न संतापयिता स भूयः ॥
करोति संताप्य तथा विनीतम् ।
स्वयं यथा स्वादिततप्तभूयः
परं न संतापयिता स भूयः ॥
अन्वयः
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खलु पञ्चबाणः त्वत्-गोचरः (सन्) तम् (अग्निम्) संताप्य तथा विनीतम् करोति, यथा सः स्वयम् स्वादित-तप्त-भूयः (सन्) भूयः परम् न संतापयिता ।
Summary
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Indeed, the five-arrowed god (Kama), with you as his target, torments and disciplines him (Agni) so effectively that Agni, having himself experienced such intense heat, will never again torment another.
पदच्छेदः
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| त्वद्गोचरः | त्वद्–गोचर (१.१) | having you as his object |
| तम् | तद् (२.१) | him (Agni) |
| खलु | खलु | indeed |
| पञ्चबाणः | पञ्चबाण (१.१) | the five-arrowed one (Kama) |
| करोति | करोति (√कृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | makes |
| संताप्य | संताप्य (सम्√तप्+णिच्+ल्यप्) | having tormented |
| तथा | तथा | in such a way |
| विनीतम् | विनीत (वि√नी+क्त, २.१) | disciplined |
| स्वयम् | स्वयम् | himself |
| यथा | यथा | so that |
| स्वादिततप्तभूयः | आस्वादित–तप्त–भूयस् (१.१) | one who has tasted much heat |
| परम् | पर (२.१) | another |
| न | न | not |
| संतापयिता | संतापयितृ (सम्√तप्+णिच्+तृच्, १.१) | will torment |
| सः | तद् (१.१) | he |
| भूयः | भूयस् | again |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्व | द्गो | च | र | स्तं | ख | लु | प | ञ्च | बा | णः |
| क | रो | ति | सं | ता | प्य | त | था | वि | नी | तम् |
| स्व | यं | य | था | स्वा | दि | त | त | प्त | भू | यः |
| प | रं | न | सं | ता | प | यि | ता | स | भू | यः |
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