अग्न्याहिता नित्यमुपासते यां
देदीप्यमानां तनुमष्टमूर्तेः ।
आशापतिस्ते दमयन्ति सोऽपि
स्मरेण दासीभवितुं न्यदेशि ॥
अग्न्याहिता नित्यमुपासते यां
देदीप्यमानां तनुमष्टमूर्तेः ।
आशापतिस्ते दमयन्ति सोऽपि
स्मरेण दासीभवितुं न्यदेशि ॥
देदीप्यमानां तनुमष्टमूर्तेः ।
आशापतिस्ते दमयन्ति सोऽपि
स्मरेण दासीभवितुं न्यदेशि ॥
अन्वयः
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दमयन्ति! अग्न्याहिताः अष्टमूर्तेः याम् देदीप्यमानाम् तनुम् नित्यम् उपासते, सः आशापतिः अपि स्मरेण ते दासीभवितुम् न्यदेशि ।
Summary
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O Damayanti! The lord of the directions (Varuna), whose resplendent form (water) the fire-worshippers constantly serve, even he has been commanded by Kama, the god of love, to become your slave.
पदच्छेदः
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| अग्न्याहिताः | अग्न्याहित (१.३) | The fire-worshippers |
| नित्यम् | नित्यम् | always |
| उपासते | उपासते (उप√आस् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | worship |
| याम् | यद् (२.१) | which |
| देदीप्यमानाम् | देदीप्यमान (√दीप्+यङ्+शानच्, २.१) | resplendent |
| तनुम् | तनु (२.१) | form |
| अष्टमूर्तेः | अष्टमूर्ति (६.१) | of the eight-formed one (Shiva/Varuna) |
| आशापतिः | आशापति (१.१) | the lord of directions (Varuna) |
| ते | युष्मद् (४.१) | your |
| दमयन्ति | दमयन्ती (८.१) | O Damayanti |
| सः | तद् (१.१) | he |
| अपि | अपि | even |
| स्मरेण | स्मर (३.१) | by Kama |
| दासीभवितुम् | दासीभवितुम् (√भू+तुमुन्) | to become a slave |
| न्यदेशि | न्यदेशि (नि√दिश् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was commanded |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ग्न्या | हि | ता | नि | त्य | मु | पा | स | ते | यां |
| दे | दी | प्य | मा | नां | त | नु | म | ष्ट | मू | र्तेः |
| आ | शा | प | ति | स्ते | द | म | य | न्ति | सो | ऽपि |
| स्म | रे | ण | दा | सी | भ | वि | तुं | न्य | दे | शि |
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