धृताधृतेस्तस्य भवद्वियोगात्
अन्यान्यशय्यारचनाय लूनैः ।
अप्यन्यदारिद्र्यहराः प्रवालैः
जाता दरिद्रास्तरवोऽमराणाम् ॥
धृताधृतेस्तस्य भवद्वियोगात्
अन्यान्यशय्यारचनाय लूनैः ।
अप्यन्यदारिद्र्यहराः प्रवालैः
जाता दरिद्रास्तरवोऽमराणाम् ॥
अन्यान्यशय्यारचनाय लूनैः ।
अप्यन्यदारिद्र्यहराः प्रवालैः
जाता दरिद्रास्तरवोऽमराणाम् ॥
अन्वयः
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भवत्-वियोगात् धृत-अधृतेः तस्य अन्य-अन्य-शय्या-रचनाय लूनैः प्रवालैः, अन्य-दारिद्र्य-हराः अपि अमराणाम् तरवः दरिद्राः जाताः ।
Summary
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"Due to separation from you, he (Indra) has become impatient. The celestial trees, though they remove the poverty of others, have themselves become poor, their sprouts having been plucked again and again to make new beds for him."
पदच्छेदः
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| धृताधृतेः | धृत–अधृति (६.१) | of him who has become impatient |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| भवद्वियोगात् | भवत्–वियोग (५.१) | due to separation from you |
| अन्यान्यशय्यारचनाय | अन्य–अन्य–शय्या–रचना (४.१) | for making new beds again and again |
| लूनैः | लून (√लू+क्त, ३.३) | by the plucked |
| अपि | अपि | though |
| अन्यदारिद्र्यहराः | अन्य–दारिद्र्य–हर (१.३) | removers of others' poverty |
| प्रवालैः | प्रवाल (३.३) | sprouts |
| जाताः | जात (√जन्+क्त, १.३) | have become |
| दरिद्राः | दरिद्र (१.३) | poor |
| तरवः | तरु (१.३) | the trees |
| अमराणाम् | अमर (६.३) | of the gods |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धृ | ता | धृ | ते | स्त | स्य | भ | व | द्वि | यो | गा |
| त | न्या | न्य | श | य्या | र | च | ना | य | लू | नैः |
| अ | प्य | न्य | दा | रि | द्र्य | ह | राः | प्र | वा | लैः |
| जा | ता | द | रि | द्रा | स्त | र | वो | ऽम | रा | णाम् |
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