तमोमयीकृत्य दिशः परागैः
स्मरेषवः शक्रदृशां दिशन्ति ।
कुहूगिरश्चञ्चुपुटं द्विजस्य
राकारजन्यामपि सत्यवाचम् ॥
तमोमयीकृत्य दिशः परागैः
स्मरेषवः शक्रदृशां दिशन्ति ।
कुहूगिरश्चञ्चुपुटं द्विजस्य
राकारजन्यामपि सत्यवाचम् ॥
स्मरेषवः शक्रदृशां दिशन्ति ।
कुहूगिरश्चञ्चुपुटं द्विजस्य
राकारजन्यामपि सत्यवाचम् ॥
अन्वयः
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स्मर-इषवः परागैः दिशः तमः-मयी-कृत्य शक्र-दृशाम् राका-रजन्याम् अपि कुहू-गिरः द्विजस्य चञ्चु-पुटम् सत्य-वाचम् दिशन्ति ।
Summary
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"The arrows of Kamadeva, having filled the directions with pollen and made them dark, make the eyes of Indra perceive the beak of the cuckoo, which cries 'kuhu', as speaking the truth (of darkness) even on a full moon night."
पदच्छेदः
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| तमोमयीकृत्य | तमोमयीकृत्य (तमस्+मयट्+च्वि√कृ+ल्यप्) | having made dark |
| दिशः | दिश् (२.३) | the directions |
| परागैः | पराग (३.३) | with pollen |
| स्मरेषवः | स्मर–इषु (१.३) | the arrows of Kamadeva |
| शक्रदृशां | शक्र–दृश् (६.३) | to the eyes of Indra |
| दिशन्ति | दिशन्ति (√दिश् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | show/make appear |
| कुहूगिरः | कुहू–गिर् (२.१) | the cuckoo |
| चञ्चुपुटं | चञ्चु–पुट (२.१) | the beak |
| द्विजस्य | द्विज (६.१) | of the bird |
| राकारजन्यामपि | राका–रजनी (७.१)–अपि | even on a full moon night |
| सत्यवाचम् | सत्य–वाच् (२.१) | as speaking the truth |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | मो | म | यी | कृ | त्य | दि | शः | प | रा | गैः |
| स्म | रे | ष | वः | श | क्र | दृ | शां | दि | श | न्ति |
| कु | हू | गि | र | श्च | ञ्चु | पु | टं | द्वि | ज | स्य |
| रा | का | र | ज | न्या | म | पि | स | त्य | वा | चम् |
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