विरम्यतां भूतवती सपर्या
निविश्यतामासनमुज्झितं किम् ।
या दूतता नः फलिना विधेया
सैवातिथेयी पृथुरुद्भवित्री ॥
विरम्यतां भूतवती सपर्या
निविश्यतामासनमुज्झितं किम् ।
या दूतता नः फलिना विधेया
सैवातिथेयी पृथुरुद्भवित्री ॥
निविश्यतामासनमुज्झितं किम् ।
या दूतता नः फलिना विधेया
सैवातिथेयी पृथुरुद्भवित्री ॥
अन्वयः
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भूतवती सपर्या विरम्यताम् । उज्झितम् आसनम् किम् न निविश्यताम्? या नः दूतता फलिना विधेया, सा एव पृथुः आतिथेयी उद्भवित्री (भविष्यति) ।
Summary
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"Let the completed hospitality cease. Why is the offered seat being left unoccupied? The very act of making my mission as a messenger fruitful will itself become the greatest hospitality."
पदच्छेदः
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| विरम्यतां | विरम्यताम् (वि√रम् भावकर्मणोः लोट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | Let...cease |
| भूतवती | भूतवत् (√भू+क्तवतु, १.१) | the completed |
| सपर्या | सपर्या (१.१) | hospitality |
| निविश्यताम् | निविश्यताम् (नि√विश् भावकर्मणोः लोट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | be occupied |
| आसनम् | आसन (१.१) | the seat |
| उज्झितं | उज्झित (√उझ्झ्+क्त, १.१) | left |
| किम् | किम् | why |
| या | यद् (१.१) | which |
| दूतता | दूतता (१.१) | mission as a messenger |
| नः | अस्मद् (६.१) | my |
| फलिना | फलिन् (१.१) | fruitful |
| विधेया | विधेया (वि√धा+यत्, १.१) | to be made |
| सा | तद् (१.१) | that |
| एव | एव | itself |
| आतिथेयी | आतिथेयी (१.१) | hospitality |
| पृथुः | पृथु (१.१) | great |
| उद्भवित्री | उद्भवितृ (उद्√भू+तृच्, १.१) | will become |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | र | म्य | तां | भू | त | व | ती | स | प | र्या |
| नि | वि | श्य | ता | मा | स | न | मु | ज्झि | तं | किम् |
| या | दू | त | ता | नः | फ | लि | ना | वि | धे | या |
| सै | वा | ति | थे | यी | पृ | थु | रु | द्भ | वि | त्री |
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