पौरस्त्यशैलं जनतोपनीतां
गृह्णन्यथाह्नः पतिरर्घ्यपूजाम् ।
तथातिथेयीमथ संप्रतीच्छ
प्रियार्पितामासनमाससाद ॥
पौरस्त्यशैलं जनतोपनीतां
गृह्णन्यथाह्नः पतिरर्घ्यपूजाम् ।
तथातिथेयीमथ संप्रतीच्छ
प्रियार्पितामासनमाससाद ॥
गृह्णन्यथाह्नः पतिरर्घ्यपूजाम् ।
तथातिथेयीमथ संप्रतीच्छ
प्रियार्पितामासनमाससाद ॥
अन्वयः
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यथा अह्नः पतिः पौरस्त्य-शैलम् जनता-उपनीताम् अर्घ्य-पूजाम् गृह्णन् (आससाद), तथा अथ (असौ) प्रिया-अर्पिताम् आतिथेयीम् संप्रतीच्छन् आसनम् आससाद ।
Summary
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Just as the lord of the day (the Sun) accepts the worship with offerings brought by the people on the eastern mountain, so did he (Nala) then, accepting the hospitality offered by his beloved, take his seat.
पदच्छेदः
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| पौरस्त्यशैलं | पौरस्त्य–शैल (२.१) | the eastern mountain |
| जनतोपनीतां | जनता–उपनीत (उप√नी+क्त, २.१) | brought by the people |
| गृह्णन् | गृह्णत् (√ग्रह्+शतृ, १.१) | accepting |
| यथा | यथा | just as |
| अह्नः | अहन् (६.१) | of the day |
| पतिः | पति (१.१) | the lord (Sun) |
| अर्घ्यपूजाम् | अर्घ्य–पूजा (२.१) | worship with offerings |
| तथा | तथा | so |
| आतिथेयीम् | आतिथेयी (२.१) | the hospitality |
| अथ | अथ | then |
| संप्रतीच्छन् | संप्रतीच्छत् (सम्+प्रति√इष्+शतृ, १.१) | accepting |
| प्रियार्पिताम् | प्रिया–अर्पित (√ऋ+णिच्+क्त, २.१) | offered by his beloved |
| आसनम् | आसन (२.१) | the seat |
| आससाद | आससाद (आ√सद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | took |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पौ | र | स्त्य | शै | लं | ज | न | तो | प | नी | तां |
| गृ | ह्ण | न्य | था | ह्नः | प | ति | र | र्घ्य | पू | जाम् |
| त | था | ति | थे | यी | म | थ | सं | प्र | ती | च्छ |
| प्रि | या | र्पि | ता | मा | स | न | मा | स | सा | द |
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