प्राप्त्यैव तावत्तव रूपसृष्टिं
निपीय दृष्टिर्जनुषः फलं मे ।
अपि श्रुती नामृतमाद्रियेतां
तयोः प्रसादीकुरुषे गिरं चेत् ॥
प्राप्त्यैव तावत्तव रूपसृष्टिं
निपीय दृष्टिर्जनुषः फलं मे ।
अपि श्रुती नामृतमाद्रियेतां
तयोः प्रसादीकुरुषे गिरं चेत् ॥
निपीय दृष्टिर्जनुषः फलं मे ।
अपि श्रुती नामृतमाद्रियेतां
तयोः प्रसादीकुरुषे गिरं चेत् ॥
अन्वयः
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तावत् मे दृष्टिः तव रूपसृष्टिम् प्राप्त्या एव निपीय जनुषः फलम् (अभवत्) । चेत् तयोः (श्रुत्योः) गिरम् प्रसादीकुरुषे, (तर्हि) श्रुती अपि अमृतम् न आद्रियेताम् ।
Summary
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Nala says to Damayanti: "Just by obtaining the sight of the creation of your beauty and drinking it in, my eyes have attained the fruit of their existence. If you would bestow the gift of your voice upon my two ears, they too would not care for nectar."
पदच्छेदः
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| प्राप्त्या | प्राप्ति (प्र√आप्+क्तिन्, ३.१) | by obtaining |
| एव | एव | just |
| तावत् | तावत् | just |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| रूपसृष्टिम् | रूप–सृष्टि (२.१) | the creation of beauty |
| निपीय | निपीय (नि√पा+ल्यप्) | having drunk in |
| दृष्टिः | दृष्टि (१.१) | (my) eye |
| जनुषः | जनुस् (६.१) | of birth |
| फलम् | फल (१.१) | the fruit |
| मे | अस्मद् (६.१) | my |
| अपि | अपि | also |
| श्रुती | श्रुति (१.२) | the two ears |
| न | न | not |
| अमृतम् | अमृत (२.१) | nectar |
| आद्रियेताम् | आद्रियेताम् (आ√दृ कर्तरि विधिलिङ् (आत्मने.) प्र.पु. द्वि.) | would care for |
| तयोः | तद् (७.२) | on them |
| प्रसादीकुरुषे | प्रसादीकुरुषे (प्रसाद+च्वि√कृ कर्तरि लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | you make a gift of |
| गिरम् | गिर् (२.१) | your voice |
| चेत् | चेत् | if |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रा | प्त्यै | व | ता | व | त्त | व | रू | प | सृ | ष्टिं |
| नि | पी | य | दृ | ष्टि | र्ज | नु | षः | फ | लं | मे |
| अ | पि | श्रु | ती | ना | मृ | त | मा | द्रि | ये | तां |
| त | योः | प्र | सा | दी | कु | रु | षे | गि | रं | चेत् |
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