ब्रवीति मे किं किमियं न जाने
संदेहदोलामवलम्ब्य संवित् ।
कस्यापि धन्यस्य गृहातिथिस्त्व-
मलीकसंभावनयाथवालम् ॥
ब्रवीति मे किं किमियं न जाने
संदेहदोलामवलम्ब्य संवित् ।
कस्यापि धन्यस्य गृहातिथिस्त्व-
मलीकसंभावनयाथवालम् ॥
संदेहदोलामवलम्ब्य संवित् ।
कस्यापि धन्यस्य गृहातिथिस्त्व-
मलीकसंभावनयाथवालम् ॥
अन्वयः
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इयम् मे संवित् संदेह-दोलाम् अवलम्ब्य किम् किम् ब्रवीति (इति) न जाने । त्वम् कस्य अपि धन्यस्य गृह-अतिथिः (असि) । अथवा अलीक-संभावनया अलम् ।
Summary
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I do not know what all this consciousness of mine, swinging on the swing of doubt, is telling me. Are you a guest in the house of some fortunate person? Or enough of this false speculation!
पदच्छेदः
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| ब्रवीति | ब्रवीति (√ब्रू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is saying |
| मे | अस्मद् (६.१) | to me |
| किम् | किम् (२.१) | what |
| किम् | किम् (२.१) | what |
| इयम् | इदम् (१.१) | this |
| न | न | not |
| जाने | जाने (√ज्ञा कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. एक.) | I know |
| संदेहदोलाम् | संदेह–दोला (२.१) | the swing of doubt |
| अवलम्ब्य | अवलम्ब्य (अव√लम्ब्+ल्यप्) | hanging on to |
| संवित् | संविद् (१.१) | consciousness |
| कस्यापि | किम् (६.१)–अपि | of some |
| धन्यस्य | धन्य (६.१) | fortunate one |
| गृहातिथिः | गृह–अतिथि (१.१) | a house-guest |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | you |
| अलीकसंभावनया | अलीक–संभावना (३.१) | with false speculation |
| अथवा | अथवा | or |
| अलम् | अलम् | enough |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ब्र | वी | ति | मे | किं | कि | मि | यं | न | जा | ने |
| सं | दे | ह | दो | ला | म | व | ल | म्ब्य | सं | वित् |
| क | स्या | पि | ध | न्य | स्य | गृ | हा | ति | थि | स्त्व |
| म | ली | क | सं | भा | व | न | या | थ | वा | लम् |
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