सेयं न धत्तेऽनुपपत्तिमुच्चैः
मच्चित्तवृत्तिस्त्वयि चिन्त्यमाने ।
ममौ स भद्रं चुलुके समुद्रः
त्वयात्तगाम्भीर्यमहत्त्वमुद्रः ॥
सेयं न धत्तेऽनुपपत्तिमुच्चैः
मच्चित्तवृत्तिस्त्वयि चिन्त्यमाने ।
ममौ स भद्रं चुलुके समुद्रः
त्वयात्तगाम्भीर्यमहत्त्वमुद्रः ॥
मच्चित्तवृत्तिस्त्वयि चिन्त्यमाने ।
ममौ स भद्रं चुलुके समुद्रः
त्वयात्तगाम्भीर्यमहत्त्वमुद्रः ॥
अन्वयः
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त्वया आत्त-गाम्भीर्य-महत्त्व-मुद्रः (त्वम्) चिन्त्यमाने (सति), सा इयम् मत्-चित्त-वृत्तिः उच्चैः अनुपपत्तिम् न धत्ते । (यतः) सः समुद्रः चुलुके भद्रम् ममौ ।
Summary
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When I contemplate you, who have assumed the stamp of gravity and greatness, this mental state of mine feels no great absurdity. After all, the great ocean itself once fit comfortably into the cupped palm of Agastya.
पदच्छेदः
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| सा | तद् (१.१) | that |
| इयम् | इदम् (१.१) | this |
| न | न | not |
| धत्ते | धत्ते (√धा कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | feels |
| अनुपपत्तिम् | अनुपपत्ति (२.१) | absurdity |
| उच्चैः | उच्चैस् | great |
| मच्चित्तवृत्तिः | मद्–चित्त–वृत्ति (१.१) | my mental state |
| त्वयि | युष्मद् (७.१) | you |
| चिन्त्यमाने | चिन्त्यमान (√चिन्त्+य+शानच्, ७.१) | being contemplated |
| ममौ | ममौ (√मा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | fit |
| सः | तद् (१.१) | that |
| भद्रम् | भद्रम् | well |
| चुलुके | चुलुक (७.१) | in a palmful of water |
| समुद्रः | समुद्र (१.१) | ocean |
| त्वयात्तगाम्भीर्यमहत्त्वमुद्रः | त्वया–आत्त (आ√दा+क्त)–गाम्भीर्य–महत्त्व–मुद्रा (१.१) | you who have assumed the stamp of gravity and greatness |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| से | यं | न | ध | त्ते | ऽनु | प | प | त्ति | मु | च्चैः |
| म | च्चि | त्त | वृ | त्ति | स्त्व | यि | चि | न्त्य | मा | ने |
| म | मौ | स | भ | द्रं | चु | लु | के | स | मु | द्रः |
| त्व | या | त्त | गा | म्भी | र्य | म | ह | त्त्व | मु | द्रः |
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