अवैमि हंसावलयो वलक्षाः
त्वत्कान्तिकीर्तेश्चपलाः पुलाकाः ।
उड्डीय युक्तं पतिताः स्रवन्ती-
वेशन्तपूरं परितः प्लवन्ते ॥
अवैमि हंसावलयो वलक्षाः
त्वत्कान्तिकीर्तेश्चपलाः पुलाकाः ।
उड्डीय युक्तं पतिताः स्रवन्ती-
वेशन्तपूरं परितः प्लवन्ते ॥
त्वत्कान्तिकीर्तेश्चपलाः पुलाकाः ।
उड्डीय युक्तं पतिताः स्रवन्ती-
वेशन्तपूरं परितः प्लवन्ते ॥
अन्वयः
AI
(अहम्) अवैमि, वलक्षाः हंस-आवलयः त्वत्-कान्ति-कीर्तेः चपलाः पुलाकाः (सन्ति) । युक्तम् (एतत् यत् ताः) उड्डीय पतिताः (सत्यः) स्रवन्ती-वेशन्त-पूरम् परितः प्लवन्ते ।
Summary
AI
I understand that these white rows of swans are the restless, bristling hairs of your fame, which is your beauty. It is fitting that, having flown up and fallen, they float all around in the full ponds of the rivers.
पदच्छेदः
AI
| अवैमि | अवैमि (अव√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I understand |
| हंसावलयः | हंस–आवलि (१.३) | rows of swans |
| वलक्षाः | वलक्ष (१.३) | white |
| त्वत्कान्तिकीर्तेः | त्वत्–कान्ति–कीर्ति (६.१) | of your fame which is your beauty |
| चपलाः | चपल (१.३) | restless |
| पुलाकाः | पुलाक (१.३) | bristling hairs (like scattered grains) |
| उड्डीय | उड्डीय (उद्√डी+ल्यप्) | having flown up |
| युक्तम् | युक्त (√युज्+क्त, १.१) | it is fitting |
| पतिताः | पतित (√पत्+क्त, १.३) | having fallen |
| स्रवन्तीवेशन्तपूरम् | स्रवन्ती–वेशन्त–पूर (२.१) | the full ponds of the rivers |
| परितः | परितस् | all around |
| प्लवन्ते | प्लवन्ते (√प्लु कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | they float |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | वै | मि | हं | सा | व | ल | यो | व | ल | क्षाः |
| त्व | त्का | न्ति | की | र्ते | श्च | प | लाः | पु | ला | काः |
| उ | ड्डी | य | यु | क्तं | प | ति | ताः | स्र | व | न्ती |
| वे | श | न्त | पू | रं | प | रि | तः | प्ल | व | न्ते |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.