कंदर्प एवेदमविन्दत त्वां
पुण्येन मन्ये पुनरन्यजन्म ।
चण्डीशचण्डाक्षिहुताशकुण्डे
जुहाव यन्मन्दिरमिन्द्रियाणाम् ॥
कंदर्प एवेदमविन्दत त्वां
पुण्येन मन्ये पुनरन्यजन्म ।
चण्डीशचण्डाक्षिहुताशकुण्डे
जुहाव यन्मन्दिरमिन्द्रियाणाम् ॥
पुण्येन मन्ये पुनरन्यजन्म ।
चण्डीशचण्डाक्षिहुताशकुण्डे
जुहाव यन्मन्दिरमिन्द्रियाणाम् ॥
अन्वयः
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मन्ये, कंदर्पः एव पुण्येन त्वाम् इदम् अन्यजन्म पुनः अविन्दत, यत् (सः) इन्द्रियाणाम् मन्दिरम् (स्वशरीरम्) चण्डीश-चण्ड-अक्षि-हुताश-कुण्डे जुहाव ।
Summary
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I think that it was Kamadeva himself who, through his merit, obtained you as another birth, because he had sacrificed his body, the abode of the senses, in the fire-pit of the fierce eye of Shiva.
पदच्छेदः
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| कंदर्पः | कंदर्प (१.१) | Kamadeva |
| एव | एव | himself |
| इदम् | इदम् (२.१) | this |
| अविन्दत | अविन्दत (√विद् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | obtained |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| पुण्येन | पुण्य (३.१) | through merit |
| मन्ये | मन्ये (√मन् कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. एक.) | I think |
| पुनः | पुनर् | again |
| अन्यजन्म | अन्य–जन्मन् (२.१) | as another birth |
| चण्डीशचण्डाक्षिहुताशकुण्डे | चण्डीश–चण्ड–अक्षि–हुताश–कुण्ड (७.१) | in the fire-pit of the fierce eye of Shiva |
| जुहाव | जुहाव (√हु कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | sacrificed |
| यत् | यत् | because |
| मन्दिरम् | मन्दिर (२.१) | the abode |
| इन्द्रियाणाम् | इन्द्रिय (६.३) | of the senses |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कं | द | र्प | ए | वे | द | म | वि | न्द | त | त्वां |
| पु | ण्ये | न | म | न्ये | पु | न | र | न्य | ज | न्म |
| च | ण्डी | श | च | ण्डा | क्षि | हु | ता | श | कु | ण्डे |
| जु | हा | व | य | न्म | न्दि | र | मि | न्द्रि | या | णाम् |
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