भूयोऽपि बाला नलसुन्दरं तं
मत्वामरं रक्षिजनाक्षिबन्धात् ।
आतिथ्यचाटून्यपदिश्य तत्स्थां
श्रियं प्रियस्यास्तुत वस्तुतः सा ॥
भूयोऽपि बाला नलसुन्दरं तं
मत्वामरं रक्षिजनाक्षिबन्धात् ।
आतिथ्यचाटून्यपदिश्य तत्स्थां
श्रियं प्रियस्यास्तुत वस्तुतः सा ॥
मत्वामरं रक्षिजनाक्षिबन्धात् ।
आतिथ्यचाटून्यपदिश्य तत्स्थां
श्रियं प्रियस्यास्तुत वस्तुतः सा ॥
अन्वयः
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सा बाला भूयः अपि रक्षिजनाक्षिबन्धात् तम् नलसुन्दरम् अमरम् मत्वा, आतिथ्यचाटूनि अपदिश्य, वस्तुतः प्रियस्य तत्स्थाम् श्रियम् अस्तुत ।
Summary
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Again, that maiden, deceiving the eyes of the guards, mistook the handsome Nala for a god. Under the pretext of flattering words of hospitality, she in reality praised the beauty residing in him, her beloved.
पदच्छेदः
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| भूयः | भूयस् | again |
| अपि | अपि | also |
| बाला | बाला (१.१) | the maiden |
| नलसुन्दरम् | नल–सुन्दर (२.१) | the one handsome as Nala |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| मत्वा | मत्वा (√मन्+क्त्वा) | having thought |
| अमरम् | अमर (२.१) | a god |
| रक्षिजनाक्षिबन्धात् | रक्षिजन–अक्षिबन्ध (५.१) | from deceiving the eyes of the guards |
| आतिथ्यचाटूनि | आतिथ्य–चाटु (२.३) | flattering words of hospitality |
| अपदिश्य | अपदिश्य (अप√दिश्+ल्यप्) | under the pretext of |
| तत्स्थाम् | तत्स्थ (२.१) | residing in him |
| श्रियम् | श्री (२.१) | the beauty |
| प्रियस्य | प्रिय (६.१) | of her beloved |
| अस्तुत | अस्तुत (√स्तु कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | praised |
| वस्तुतः | वस्तुतस् | in reality |
| सा | तद् (१.१) | she |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भू | यो | ऽपि | बा | ला | न | ल | सु | न्द | रं | तं |
| म | त्वा | म | रं | र | क्षि | ज | ना | क्षि | ब | न्धात् |
| आ | ति | थ्य | चा | टू | न्य | प | दि | श्य | त | त्स्थां |
| श्रि | यं | प्रि | य | स्या | स्तु | त | व | स्तु | तः | सा |
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