आलोकतृप्तीकृतलोक यस्त्वाम्
असूत पीयूषमयूखमेनम् ।
कः स्पर्धितुं धावति साधु सार्धम्
उदन्वता नन्वयमन्ववायः ॥
आलोकतृप्तीकृतलोक यस्त्वाम्
असूत पीयूषमयूखमेनम् ।
कः स्पर्धितुं धावति साधु सार्धम्
उदन्वता नन्वयमन्ववायः ॥
असूत पीयूषमयूखमेनम् ।
कः स्पर्धितुं धावति साधु सार्धम्
उदन्वता नन्वयमन्ववायः ॥
अन्वयः
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आलोकतृप्तीकृतलोक ! यः (उदन्वान्) एनम् पीयूषमयूखम् असूत, (सः एव) त्वाम् (अपि असूत) । कः उदन्वता सार्धम् साधु स्पर्धितुम् धावति? ननु अयम् (तव) अन्ववायः (अस्ति) ।
Summary
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O you who gratify the world with your sight! He (the ocean) who produced this nectar-rayed moon also produced you. Who indeed runs to compete properly with the ocean? Surely, such is your lineage.
पदच्छेदः
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| आलोकतृप्तीकृतलोक | आलोक–तृप्तीकृत (√कृ+च्वि+क्त)–लोक (८.१) | O you who gratify the world with your sight! |
| यः | यद् (१.१) | who |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| असूत | असूत (√सू कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | produced |
| पीयूषमयूखम् | पीयूष–मयूख (२.१) | the nectar-rayed one (the moon) |
| एनम् | एतद् (२.१) | this |
| कः | किम् (१.१) | who |
| स्पर्धितुम् | स्पर्धितुम् (√स्पर्ध्+तुमुन्) | to compete |
| धावति | धावति (√धाव् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | runs |
| साधु | साधु | well |
| सार्धम् | सार्धम् | with |
| उदन्वता | उदन्वत् (३.१) | with the ocean |
| ननु | ननु | surely |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| अन्ववायः | अन्ववाय (१.१) | lineage |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | लो | क | तृ | प्ती | कृ | त | लो | क | य | स्त्वा |
| म | सू | त | पी | यू | ष | म | यू | ख | मे | नम् |
| कः | स्प | र्धि | तुं | धा | व | ति | सा | धु | सा | र्ध |
| मु | द | न्व | ता | न | न्व | य | म | न्व | वा | यः |
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