यथाकृतिः काचन ते यथा वा
दौवारिकान्धंकरणी च शक्तिः ।
रुच्यो रुचीभिर्जितकाञ्चनीभिः
तथासि पीयूषभुजां सनाभिः ॥
यथाकृतिः काचन ते यथा वा
दौवारिकान्धंकरणी च शक्तिः ।
रुच्यो रुचीभिर्जितकाञ्चनीभिः
तथासि पीयूषभुजां सनाभिः ॥
दौवारिकान्धंकरणी च शक्तिः ।
रुच्यो रुचीभिर्जितकाञ्चनीभिः
तथासि पीयूषभुजां सनाभिः ॥
अन्वयः
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ते यथा काचन आकृतिः (अस्ति), वा यथा दौवारिक-अन्धं-करणी शक्तिः च (अस्ति), तथा जित-काञ्चनीभिः रुचीभिः रुच्यः (त्वम्) पीयूष-भुजाम् स-नाभिः असि ।
Summary
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Just as your form is indescribably beautiful, and just as you have a power that blinds the gatekeepers, so too, being charming with your lustres that surpass gold, you seem to be a kinsman of the gods.
पदच्छेदः
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| यथा | यथा | just as |
| आकृतिः | आकृति (१.१) | form |
| काचन | काचन (१.१) | some (indescribable) |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| यथा | यथा | and as |
| वा | वा | or |
| दौवारिकान्धंकरणी | दौवारिकान्धंकरणी (१.१) | which makes the gatekeepers blind |
| च | च | and |
| शक्तिः | शक्ति (१.१) | power |
| रुच्यः | रुच्य (१.१) | charming |
| रुचीभिः | रुचि (३.३) | with splendors |
| जितकाञ्चनीभिः | जितकाञ्चनी (३.३) | which have surpassed gold |
| तथा | तथा | so also |
| असि | असि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you are |
| पीयूषभुजाम् | पीयूषभुज् (६.३) | of the nectar-eaters (gods) |
| सनाभिः | सनाभि (१.१) | a kinsman |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | था | कृ | तिः | का | च | न | ते | य | था | वा |
| दौ | वा | रि | का | न्धं | क | र | णी | च | श | क्तिः |
| रु | च्यो | रु | ची | भि | र्जि | त | का | ञ्च | नी | भिः |
| त | था | सि | पी | यू | ष | भु | जां | स | ना | भिः |
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