पुण्ये मनः कस्य मुनेरपि स्या-
त्प्रमाणमास्ते यदधेऽपि धावत् ।
तच्चिन्ति चित्तं परमेश्वरस्तु
भक्तस्य हृष्यत्करुणो रुणद्धि ॥
पुण्ये मनः कस्य मुनेरपि स्या-
त्प्रमाणमास्ते यदधेऽपि धावत् ।
तच्चिन्ति चित्तं परमेश्वरस्तु
भक्तस्य हृष्यत्करुणो रुणद्धि ॥
त्प्रमाणमास्ते यदधेऽपि धावत् ।
तच्चिन्ति चित्तं परमेश्वरस्तु
भक्तस्य हृष्यत्करुणो रुणद्धि ॥
अन्वयः
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कस्य मुनेः अपि मनः पुण्ये प्रमाणम् स्यात्? यत् (मनः) अधे अपि धावत् आस्ते । तु परमेश्वरः हृष्यत्-करुणः (सन्) भक्तस्य तत् चिन्ति चित्तम् रुणद्धि ।
Summary
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Whose mind, even a sage's, can be an authority in matters of virtue, since it also remains running towards sin? But the Supreme Lord, his compassion aroused, restrains that wandering mind of his devotee.
पदच्छेदः
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| पुण्ये | पुण्य (७.१) | in virtue |
| मनः | मनस् (१.१) | mind |
| कस्य | किम् (६.१) | whose |
| मुनेः | मुनि (६.१) | of a sage |
| अपि | अपि | even |
| स्यात् | स्यात् (√अस् कर्तरि लिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | could be |
| प्रमाणम् | प्रमाण (१.१) | authority |
| आस्ते | आस्ते (√आस् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | remains |
| यत् | यद् (१.१) | which |
| अधे | अधस् | towards sin |
| अपि | अपि | also |
| धावत् | धावत् (√धाव्+शतृ, १.१) | running |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| चिन्ति | चिन्ति (२.१) | wandering |
| चित्तम् | चित्त (२.१) | mind |
| परमेश्वरः | परमेश्वर (१.१) | the Supreme Lord |
| तु | तु | but |
| भक्तस्य | भक्त (६.१) | of a devotee |
| हृष्यत्करुणः | हृष्यत् (√हृष्+शतृ)–करुण (१.१) | whose compassion is aroused |
| रुणद्धि | रुणद्धि (√रुध् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | restrains |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पु | ण्ये | म | नः | क | स्य | मु | ने | र | पि | स्या |
| त्प्र | मा | ण | मा | स्ते | य | द | धे | ऽपि | धा | वत् |
| त | च्चि | न्ति | चि | त्तं | प | र | मे | श्व | र | स्तु |
| भ | क्त | स्य | हृ | ष्य | त्क | रु | णो | रु | ण | द्धि |
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