भूलोकभर्तुर्मुखपाणिपाद-
पद्मैः परीरम्भमवाप्य तस्य ।
दमस्वसुर्दृष्टिसरोजराजिः
चिरं न तत्याज सबन्धुबन्धम् ॥
भूलोकभर्तुर्मुखपाणिपाद-
पद्मैः परीरम्भमवाप्य तस्य ।
दमस्वसुर्दृष्टिसरोजराजिः
चिरं न तत्याज सबन्धुबन्धम् ॥
पद्मैः परीरम्भमवाप्य तस्य ।
दमस्वसुर्दृष्टिसरोजराजिः
चिरं न तत्याज सबन्धुबन्धम् ॥
अन्वयः
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दम-स्वसुः दृष्टि-सरोज-राजिः तस्य भू-लोक-भर्तुः मुख-पाणि-पाद-पद्मैः परीरम्भम् अवाप्य, चिरम् स-बन्धु-बन्धम् न तत्याज ।
Summary
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Having obtained an embrace with the lotus-like face, hands, and feet of that ruler of the earth, the row of Damayanti's lotus-like glances did not for a long time abandon that connection, as if with its own kin.
पदच्छेदः
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| भूलोकभर्तुः | भू–लोक–भर्तृ (६.१) | of the ruler of the earth |
| मुखपाणिपादपद्मैः | मुख–पाणि–पाद–पद्म (३.३) | with the lotus-like face, hands, and feet |
| परीरम्भम् | परीरम्भ (२.१) | embrace |
| अवाप्य | अवाप्य (अव√आप्+ल्यप्) | having obtained |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| दमस्वसुः | दमस्वसृ (६.१) | of Damayanti |
| दृष्टिसरोजराजिः | दृष्टि–सरोज–राजि (१.१) | the row of lotus-like glances |
| चिरम् | चिरम् | for a long time |
| न | न | not |
| तत्याज | तत्याज (√त्यज् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | abandoned |
| सबन्धुबन्धम् | सबन्धुबन्ध (२.१) | the connection with its kin |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भू | लो | क | भ | र्तु | र्मु | ख | पा | णि | पा | द |
| प | द्मैः | प | री | र | म्भ | म | वा | प्य | त | स्य |
| द | म | स्व | सु | र्दृ | ष्टि | स | रो | ज | रा | जिः |
| चि | रं | न | त | त्या | ज | स | ब | न्धु | ब | न्धम् |
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