सूक्ष्मे घने नैषधकेशपाशे
निपत्य निस्पन्दतरीभवद्भ्याम् ।
तस्यानुबन्धं न विमोच्य गन्तुम्
अपारि तल्लोचनखञ्जनाभ्याम् ॥
सूक्ष्मे घने नैषधकेशपाशे
निपत्य निस्पन्दतरीभवद्भ्याम् ।
तस्यानुबन्धं न विमोच्य गन्तुम्
अपारि तल्लोचनखञ्जनाभ्याम् ॥
निपत्य निस्पन्दतरीभवद्भ्याम् ।
तस्यानुबन्धं न विमोच्य गन्तुम्
अपारि तल्लोचनखञ्जनाभ्याम् ॥
अन्वयः
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सूक्ष्मे घने नैषध-केश-पाशे निपत्य निस्पन्द-तरी-भवद्भ्याम् तत्-लोचन-खञ्जनाभ्याम् तस्य अनुबन्धम् विमोच्य गन्तुम् न अपारि ।
Summary
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Having fallen into the fine, thick net of Nala's hair, her two wagtail-like eyes, becoming increasingly still, were unable to release their connection to it and move away.
पदच्छेदः
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| सूक्ष्मे | सूक्ष्म (७.१) | on the fine |
| घने | घन (७.१) | on the thick |
| नैषधकेशपाशे | नैषध–केश–पाश (७.१) | in the net of Nala's hair |
| निपत्य | निपत्य (नि√पत्+ल्यप्) | having fallen |
| निस्पन्दतरीभवद्भ्याम् | निस्पन्दतर–भवत् (√भू+शतृ, ३.२) | by the two which were becoming more still |
| तस्य | तद् (६.१) | its |
| अनुबन्धम् | अनुबन्ध (२.१) | connection |
| न | न | not |
| विमोच्य | विमोच्य (वि√मुच्+ल्यप्) | having released |
| गन्तुम् | गन्तुम् (√गम्+तुमुन्) | to go |
| अपारि | अपारि (√पॄ भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | it was possible |
| तल्लोचनखञ्जनाभ्याम् | तद्–लोचन–खञ्जन (३.२) | by her two wagtail-like eyes |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सू | क्ष्मे | घ | ने | नै | ष | ध | के | श | पा | शे |
| नि | प | त्य | नि | स्प | न्द | त | री | भ | व | द्भ्याम् |
| त | स्या | नु | ब | न्धं | न | वि | मो | च्य | ग | न्तु |
| म | पा | रि | त | ल्लो | च | न | ख | ञ्ज | ना | भ्याम् |
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