स्वप्नेन प्रापितायाः प्रतिरजनि तव श्रीषु मग्नः कटाक्षः
श्रोत्रे गीतामृताब्धौ त्वगपि ननु तनूमञ्जरीसौकुमार्ये ।
नासा श्वासाधिवासेऽधरमधुनि रसज्ञा चरित्रेषु चित्तं
तन्नस्तन्वङ्गि कैश्चिन्न करणहरिणैर्वागुरा लङ्घितासि ॥
स्वप्नेन प्रापितायाः प्रतिरजनि तव श्रीषु मग्नः कटाक्षः
श्रोत्रे गीतामृताब्धौ त्वगपि ननु तनूमञ्जरीसौकुमार्ये ।
नासा श्वासाधिवासेऽधरमधुनि रसज्ञा चरित्रेषु चित्तं
तन्नस्तन्वङ्गि कैश्चिन्न करणहरिणैर्वागुरा लङ्घितासि ॥
श्रोत्रे गीतामृताब्धौ त्वगपि ननु तनूमञ्जरीसौकुमार्ये ।
नासा श्वासाधिवासेऽधरमधुनि रसज्ञा चरित्रेषु चित्तं
तन्नस्तन्वङ्गि कैश्चिन्न करणहरिणैर्वागुरा लङ्घितासि ॥
अन्वयः
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हे तन्वङ्गि ! प्रति-रजनि स्वप्नेन प्रापितायाः तव श्रीषु (नः) कटाक्षः मग्नः, श्रोत्रे गीत-अमृत-अब्धौ (मग्ने), त्वक् अपि ननु तनु-मञ्जरी-सौकुमार्ये (मग्ना), नासा श्वास-अधिवासे (मग्ना), रसज्ञा अधर-मधुनि (मग्ना), चित्तम् चरित्रेशु (मग्नम्) । तत् नः कैश्चित् करण-हरिणैः (त्वम्) वागुरा न लङ्घिता असि ।
Summary
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O slender one! Every night, our eyes are immersed in your beauty brought by dreams, our ears in the nectar-ocean of your song, our skin in the tenderness of your sprout-like body, our nose in the fragrance of your breath, our tongue in the honey of your lips, and our mind in your virtues. Therefore, you, like a snare, have not been escaped by any of our sense-organs, which are like deer.
पदच्छेदः
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| स्वप्नेन | स्वप्न (३.१) | by dream |
| प्रापितायाः | प्रापित (प्र√आप्+णिच्+क्त, ६.१) | of you who are brought |
| प्रतिरजनि | प्रतिरजनि | every night |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| श्रीषु | श्री (७.३) | in the beauties |
| मग्नः | मग्न (√मस्ज्+क्त, १.१) | is immersed |
| कटाक्षः | कटाक्ष (१.१) | the eye |
| श्रोत्रे | श्रोत्र (१.२) | the two ears |
| गीत | गीत | song |
| अमृत | अमृत | nectar |
| अब्धौ | अब्धि (७.१) | in the ocean of |
| त्वक् | त्वच् (१.१) | the skin |
| अपि | अपि | also |
| ननु | ननु | indeed |
| तनु | तनु | body |
| मञ्जरी | मञ्जरी | sprout |
| सौकुमार्ये | सौकुमार्य (७.१) | in the tenderness of |
| नासा | नासा (१.१) | the nose |
| श्वास | श्वास | breath |
| अधिवासे | अधिवास (७.१) | in the fragrance of |
| अधर | अधर | lip |
| मधुनि | मधु (७.१) | in the honey of |
| रसज्ञा | रसज्ञा (१.१) | the tongue |
| चरित्रेषु | चरित्र (७.३) | in the virtues |
| चित्तं | चित्त (१.१) | the mind |
| तत् | तद् | therefore |
| नः | अस्मद् (६.३) | our |
| तन्वङ्गि | तन्वङ्गी (८.१) | O slender-bodied one |
| कैश्चित् | किञ्चित् (३.३) | by any |
| न | न | not |
| करण | करण | sense-organs |
| हरिणैः | हरिण (३.३) | by the deer that are |
| वागुरा | वागुरा (१.१) | a snare |
| लङ्घिता | लङ्घित (√लङ्घ्+क्त, १.१) | escaped |
| असि | असि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you are |
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्व | प्ने | न | प्रा | पि | ता | याः | प्र | ति | र | ज | नि | त | व | श्री | षु | म | ग्नः | क | टा | क्षः |
| श्रो | त्रे | गी | ता | मृ | ता | ब्धौ | त्व | ग | पि | न | नु | त | नू | म | ञ्ज | री | सौ | कु | मा | र्ये |
| ना | सा | श्वा | सा | धि | वा | से | ऽध | र | म | धु | नि | र | स | ज्ञा | च | रि | त्रे | षु | चि | त्तं |
| त | न्न | स्त | न्व | ङ्गि | कै | श्चि | न्न | क | र | ण | ह | रि | णै | र्वा | गु | रा | ल | ङ्घि | ता | सि |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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